Thursday, October 7, 2010

एक मामूली घटना

स्वाभाव से में एक शांत और अंतर्मुखी व्यक्तित्व का मालिक हूँ, और किसी को कभी "ना" नहीं कह पाता हूँ अगर वो बात या काम मेरे पहुँच में हैं. अक्सर में मेरे आस पास होने वाली घटनाओ को देख कर उनके पीछे होने वाली वजह को समझने की कोशिश करता हूँ, जिनको शायद बहुत लोग या तो ध्यान ही नहीं देते हैं या घटित होते ही भूल जाते है या सारे दिन भर अपना मूड ख़राब कर के घूमते रहते हैं.

मैं सुबह एक निर्धारित समय पर घर से ऑफिस के लिए निकलता हूँ और समय पर पहुँच जाता हूँ, अक्सर मैं सार्वजानिक वाहनों का उपयोग करता हूँ खासकर थ्री व्हीलर (ऑटो)! हमारे ऑफिस मैं अगर कोई भी लेट होता हैं तो उसका half day अंकित किया जाता है और कोई भी बहाना स्वीकार नहीं किया जाता . जिससे ऑफिस का टाइम मैनेजमेंट बना रहता है.

आज जब मैं घर से ऑफिस के लिए निकला तो मेरे घर से निकल कर मेन रोड को जोड़ने वाली रोड को सार्वजनिक यातायात के लिए बंद कर दिया गया था केवल personal वाहन ही उस रोड से गुज़र सकते थे. लोकल रोड से मेन रोड तक की दूरी ३ किलो मीटर के लगभग हैं जिसमें मुझे कम से कम १५-२० मिनट का समय लगता और मे ऑफिस के लिए पक्का लेट हो जाता, तो मैंने सोचा की क्यूँ न लिफ्ट मांग कर देखा जाए.

मैंने करीबन १५-२० वाहनों से कोशिश करी लेकिन किसी ने भी यह जानते हुए भी की इस मार्ग पर सार्वजानिक वाहन बंद है लिफ्ट देने की ज़हमत नहीं उठाई. बहरहाल मैं मेन रोड तक का सफ़र पद यात्रा से पूर्ण किया और फलस्वरूप ऑफिस लेट पहुंचा.

हालांकि यह एक मामूली घटना हैं जिसमें हम सरकार के अलावा किसी को दोष नहीं दे सकते, लेकिन इंसानियत नाम को जो एक शब्द होता है वह शायद अधिकतर लोग भूल चुके हैं!

अब आप लोगों से गुज़ारिश हैं की आप उपरोक्त घटना पर अपने विचार व्यक्त करे या फिर अपने साथ हुयी कोई घटना यहाँ पर लिखे जिसे अन्य सदस्य पड़ कर उसके बारे में अपने विचार रख सके.

Incident

Lot’s of incidents took place in everybody’s life almost everyday and I am the person who observes such incidents and try to find out the reason behind the incident, in same cases people don’t notice or just forget or don’t bother to think about that or spoiled their mood for whole day.

I am the person who don’t know how to speak “NO”, I hardly refuse any one if the thing is under my control or reach or I can do anything for him/her and I know that there are most of people are opposite me, they will refuse by one excuse or other.

Today’s incident about which I thought let’s share with you and know what other people think about it and what is their way of thinking: -

I used to commute my office by public transport and used most of time sharing Auto, due to some reason police has blocked the road from where I took auto to get another auto to reach my office, only personal vehicles are allowed to move on that particular road for today, when I reached on the road, saw that there is no public vehicles on the road and that’s around 3 km distance to reach main road, my office timing is very strict and if any employee reach late they mark half day absent without considering any excuse, so, I thought now there is no way to reach office on time, coz I have to walk upto main road and it will consume enough time, so thought let’s try to take lift, I tried a lot of vehicles but none of them bother to help anyone, any way I walked and reached office late.

Thursday, September 30, 2010

गढ़वाली भाषा

जब भी कोई Regional सांस्कृतिक कार्यक्रम होता हैं तो जितने भी उस region से related लोग आते हैं सब का आने का मकसद अलग अलग होता हैं , अधिकतर तो कार्यकर्म देखने आते हैं , बाकी मस्ती के लिए आते हैं .

आयोज़को की तरफ से तो अपनी संसकिरिति के पार्टी शर्धा नज़र आती हैं . ऐसे कार्यक्रम वही आयोजित करते हैं जिनके दिल मैं अपने उत्तराखंड की संकृति के प्रति प्यार और स्नेह होता हैं और उसे अपने लोगों में बांटने की कोशिश करते है .

यह इस बात का एक जीता जगता साबुत हैं की जो अपनी संस्कृति से प्यार करते हैं व्हो उसको बढाने की सोचते हैं किसी न किसी रूप मैं और जो लोग अपनी संस्कृति को पसंद करते हैं ऐसे कार्यकर्मों मैं बड चड़कर हिस्सा लेते हैं .

अगर हम अपनी संकृति को बड़ा नहीं सकते तो कम से कम अपने अन्दर तो जिन्दा रख सकते हैं .

हर चीज़ मैं फायदा नुक्सान और status symbol की तरह देखा जा रहा हैं , यहाँ तक की अपनी मात्र भाषा मैं भी …मुझे लगता हैं की कई लोग ऐसा सोचते हैं की गढ़वाली होने पर गढ़वाली न जानना एक Positive Sign है , या तो वह इंग्लिश बोलने की कोशिश करता हैं या फिर इंग्लिश मिश्रित हिंदी पर गढ़वाली से परहेज़ करता हैं , उसे लगता हैं की गढ़वाली मैं बात करना जैसे कोई मायने नहीं रखता और उसकी बात को परभावी नहीं बनाता, like hindi in Hindustan.

Wednesday, September 22, 2010

नजरिया

हर इंसान की एक अपनी एक सोच और नजरिया होता हैं किसी भी घटना और वस्तु को देखने का इसलिए यह जरूरी नहीं की जो एक इंसान कहे वह बात दुसरे इंसान को पसंद आये!
जो भी मैं यहाँ पर व्यक्त कर रहा हूँ वह मेरा अपना नजरिया हैं और मैं जानता हूँ की हर कोई इस बात से सहमत नहीं होगा.

जो मेरे नज़रिए को समझेगा वह शायद मेरी भावनाओं को समझ सकता हैं और जिनका नजरिया मेरे से अलग होगा वह शायद मेरी इन भावनाओं को किसी और रूप मैं ले सकते हैं.

Wednesday, September 15, 2010

गढ़वाल की विलुप्त होती रोनक

इंसान की भावनाए, चाहते अक्सर समय के अनुसार बदलती रहती हैं!
ऐसा ही हाल शहर मैं और गाँव मैं रहने वाले गढ़वालियों का भी हैं. शहर मैं रहने वाले सोच रहे हैं की रिटायर होने के बाद गाँव मैं जायेंगे और वही पर अपनी जिंदगी अपने लोगों, पहाड़ो, खेतो के बीच बिताएंगे!
वहीँ गाँव मैं रहने वाला गढ़वाली सोच रहा हैं की मैं कब इस गाँव को छोड़ कर शहर मैं जा कर बस जाऊं और इस गढ़वाल के मुश्किल और दूभर जिंदगी से छुटकारा पाके शहर की आराम दायक जिंदगी का लुत्फ़ उठाऊं.

जिस मैं जीत गाँव मैं रहने वाले गढ़वाली की होती परतीत हैं, कुछ तो सफल हो जाते हैं तो बाद मैं गाँव मैं रिटायर हो के गाँव जाने का विचार करते हैं लेकिन कुछ गढ़वाली शहर मैं आकर फंस जाते हैं पर शर्म, असफलता से दुबारा घर जाना उचित नहीं समझते!

आलम यह हो चूका हैं की अगर आप शहर मैं रहते हो और शादी या अन्य किसी समारोह के बिना गाँव जाते हो तो आप को वहां इतनी बोरियत महसूस होती है की आप दुसरे ही दिने वापस आने का प्रोग्राम बना लेते हो, इसके पीछे दिन परती दिन गाँव से होने वाला पलायन हैं, जिस से गाँव की रौनक एक तरह से समाप्त सी हो गयी हैं!

Tuesday, July 13, 2010

गढ़वाल की शादी

पिछले महीने मैं अपने दोस्त की शादी मैं गढ़वाल गया, बहुत मजे किये, गढ़वाल की शादी की बात ही कुछ और होती हैं.
दो घटनाएँ जो थोडा हट के थी

१. बारात मैं हम दो दोस्त अलग से ही थे दुल्हे के साथ, मैं दारु और अन्य नशीली चीजों का सेवन नहीं करता लेकिन मेरे साथ जो दोस्त था वह इनका सेवन करता हैं. बारात पहुचने पर और नास्ते के बाद सब पीने वाले अपना प्रोग्राम बना रहे थे, लेकिन मैं नहीं पीता था तो अलग सा हो गया और बारात मैं भी अपने आप को अकेला सा महसूस करने लगा क्यूंकि सब पीने वाले अपनी महफिले लगा चुके थे और उसके बाद जो गप्पे चल रही थी वह मेरे बर्दास्त के बहार थी.
सबक: गढ़वाल की शादी मैं अगर आप नहीं पीते तो आपका जाना बेकार हैं.

२. मैं बारात से जल्दी निकल गया था तो वापसी का रास्ता पैदल का था तो मैं अपनी मंजिल की तरफ चला जा रहा था, रास्ते मैं एक गाँव पड़ा और मैंने एक घर से पानी के लीये आग्रह किया उन्होंने पूछा कहाँ से आये हो और कहाँ जा रहे हो, बताने पर उन्होंने कहा की नहीं आप जो सामने दूसरा घर हैं वहां से पानी मांगो, मैं समझ गया की यह हरिजन का घर हैं.

सबक: गाँव मैं जात पात का चलन शायद ही कभी मिट पायेगा.

Friday, June 18, 2010

नेगी जी और नए गायक

नेगी जी ने गढ़वाल की परिस्थितियों, वहां के लोगों की भावनाओं (ख़ुशी, गम, मिलना, बिछड़ना, याद, बचपन, जवानी, बुडापा इत्यादी) को जिस तरह शब्द देकर गीतों मैं पिरोया हैं वह अतुलनीय हैं, उनके जैसे इन्सान को पाकर गढ़वाल धन्य हैं.

लेकिन जिस तरह से परिस्थितियां और भावनाए बदल रही हैं उसी तरह लोग भी बदल रहे हैं, लोगो की पसंद भी बदल रही हैं.

जो लोग अन्य गायकों के गानों को पसंद कर रहे हैं उनके लीये तो नेगी जी और अन्य गायक बराबर हैं और भविष्य में नेगी जे के आभाव में तो यह नए गायक ही उनके लीये गढ़वाल के उच्चतम गायक बन जायेंगे.

भविष्य में जब कल वाली परिस्थितियां और गायक नहीं रहेंगे तो जो भी नया गायक वर्तमान परिश्थितियों और भावनाओं को थोडा बहुत भी अपने गीतों में ढाल पायेगा वही भविष्य का गायक बन जाएगा.

भले हम लता, किशोर, रफ़ी जैसे गायांकों को नहीं भुला सकते पर सोनू निगम, उदित नारायण, के. के., सुनिधि जैसे गायकों को भी नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते.

Thursday, June 17, 2010

आग और धुआं

बिना आग के तो धुआं नहीं उठता
अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे की जितने भी परिवार गाँव मैं विषम परिस्तिथियों में जी रहे हैं उसमें कहीं न कहीं दारु का एक महतवपूर्ण योगदान हैं. गाँव मैं ज्यादातर फौजी रहते हैं और पेंसन आने के बाद अगर उन्होंने कोई काम धंधा कर लिया तो ठीक नहीं तो सिर्फ दारु पिने के लिए जीवित हैं, जिसकी वजह से उनके परिवार वालों को न जाने क्या क्या सेहन करना पड़ता हैं!

रोज़गार गाँव मैं कम ही हैं और जो भी हैं वो मेहनत वाला होता हैं ऐसे मैं जब आदमी सारा दिन काम करता हैं और शाम को दारू पर पैसे बर्बाद कर देता हैं तो उसके असर को आप एक परिवार का सदस्य न होने पर भी महसूस कर सकते हैं, ऐसे अनेको उदाहरण आपको हर गाँव में मिल जायेंगे.
दारु वैसे तो सभी की एक बहुत बड़ी कमजोरी हैं लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर गढ़वाल में इसके काफी भयंकर परिणाम देखने को मिलते हैं जिसके चलते परिवार का कोई सदस्य प्रगति नहीं कर पाता!

अब तो आलम यह हो चूका हैं हे की १० साल का बच्चा भी दारू की गिरफ्त में आ चूका हे और व्यस्क होने पर और अपूर्ण शिक्षा और परिवार के भरण पोसन की जिमेदारी लेकर शहर मैं पहुँचता हैं तो दारु को ही अपना साथी मानता है

Wednesday, June 9, 2010

पर्तिस्पर्धा समझे या इर्ष्या

जिस से भी पूछा उसने यही कहा की हाँ उत्तरांचली लोग एक दुसरे से इर्ष्या करते हैं, वजह तो स्पष्ट कोई नहीं कर पाया पर कही न कही ये साबित हो रहा हैं की यह एक कडवी सच्चाई है की पहले के और अब के लोगों मैं बहुत बड़ा बदलाव देखा गया हैं. इस बदलाव को आप अपने हिसाब से जैसे चाहे देखे, चाहे पर्तिस्पर्धा समझे या इर्ष्या.

हम गढ़वाली हैं और हमें आज भी कहने मे गर्व होता है की हम गढ़वाली हैं.
इसके पीछे वजह क्या हैं शायद हमारा समाज मैं एक अच्छा रुतबा होना हमारी संस्कृति, इमानदारी, मेहनतकश इत्यादी होने की वजह से जो की हमारे बाप दादाओं ने कमाया था!
अब हर छेत्र में पर्तिस्पर्धा बड गयी हैं और इसमें शिक्षा का सबसे ज्यादा योगदान है और हमारे गढ़वाल की शिक्षा का स्तर बहुत ही निम्न हे ऐसे में जिसके पास पैसा है वो बहार जा कर शिक्षा प्राप्त कर रहा हैं और आगे बड रहा हैं लेकिन फिर भी ज्यादातर लोग गढ़वाल मैं गरीब है जिसके चलते वो सही शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते और सही शिक्षा के आभाव में भटक जाते है और बड़ते हुए लोगों को देख कर हीन भावना का शिकार होकर निराशा में गलत कदम उठा देते हैं.

Tuesday, June 8, 2010

वास्तविकता का भविष्य

हम नेगी जी के गानों को पसंद करते हैं क्यूंकि उन्होनो गढ़वाल की उन परिस्थितयों, भावनाओं पर गाने लिखे हैं जिनको हम सब ने देखा और महसूस किया हैं इसलिएवो हम सब के चहेते हैं.
गढ़वाल और गढ़वाल के लोग धीरे धीरे बदलते जा रहे हैं साथ मैं परिस्तिथियाँ और भावनायें भी बदल रही हैं, भविष्य मैं जब ऐसी कोई परिस्तिथि और भावनाए नहीं रहेगी जो नेगी जी ने अपने गानों में पिरो रखे हैं तो क्या नयी पीडी को लगेगा की नेगी जी के गानों का वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं हैं.

Saturday, June 5, 2010

गढ़वाल और जातपात

जातपात का गढ़वाल मैं अपना एक महत्व हैं जो की काफी मजबूत था और अभी भी हमारे बाप दादाओं मैं काफी हद तक अपनी जगह बनाये हुए हैं और हम इस बात को किसी भी रूप मैं ठुकरा नहीं सकते, धीरे धीरे जातपात का असर कम होता जा रहा हैं लेकिन यह शायद कभी ख़तम नहीं हो पायेगा, न केवल गढ़वाल मैं बल्कि पुरे भारतवर्ष मैं. गढ़वाल मैं अपने आप को ऊँची जात का होना और समझा जाना काफी महत्व रखता था और अभी भी काफी लोगों मैं यह भावना भरी हुयी हैं की हम ऊँची जात के हैं और दूसरा नीची जात का, रिश्ते भी जाती के आधार पर बनाये जाते हैं, क्षत्रियों और ब्राह्मणों मैं ही आपस मैं जब जातपात का भेदभाव चलता हैं तो हरिज़नो के साथ यह अपनी उच्चतम सीमा पर होता हैं. आप को क्या लगता हैं की क्या जातपात गढ़वाल से समाप्त हो पायेगा?

Monday, May 10, 2010

हर गढ़वाली के मन मैं अपने गढ़वाल की बहुत से यादें बसी हैं जो की उसे गढ़वाली होने पर गर्वान्वित कराती हैं. सिर्फ रोज़गार के लीये उसे अपना गाँव छोडना पड़ा और शहर का रुख करना पड़ा, यहाँ आ कर मुश्किल हालातों से जूझते हुए अपने आप को इस शहर के अनुकूल ढाला, जिसमे बहुत से कठिन हालातों से गुजरना पड़ा, और शायद अब चाहता हैं की जैसे हालत उसने झेले हैं वह उसके बच्चों को न झेलने पड़े.
जमाना बदल रहा हैं और ज़माने के साथ सब कुछ बदल रहा है, ज़माने के साथ अगर कदम मिला सको तो शायद अपना अस्तित्व बचा सको नहीं तो विलुप्त होने में कोई देर नहीं लगती. शहर की तुलना मैं हमारा गढ़वाल काफी अच्छा है, लेकिन दिन प्रति दिन शहर गढ़वाल पर हावी हो रहा हैं.पानी गाँव मैं उपलब्द नहीं हैं लेकिन कोल्ड ड्रिंक्स का नवीन फ्लेवर हर जगह मिल जाएगा.
गढ़वाल और इसके लोगों मैं अभी अपनापन जिन्दा हैं लेकिन अगर आप महसूस करे तो पायेंगे की लोग गढ़वाल मैं अपनी जड़े मजबूत करने की तुलना में उखाड़ ज्यादा रहे हैं.

मैं अभी तक एक भी ऐसे बच्चे से नहीं मिला हूँ जिसने की अपना बचपन शहर में बिताया हो या बिता रहा हैं उसको गढ़वाली भाषा का ज्ञान हो, वो समझ सकता हैं पर उसको बोल नहीं पाता, इसके पीछे वजह हैं की उसके सरंशक आपस मैं गढ़वाली मैं बातें करते हैं जिसकी वजह से उसको अपनी भाषा का केवल समझाने का ज्ञान हे, लेकिन जब यही बच्चे आगे चल कर अपनी नयी पीड़ी चलाएंगे और इनके गढ़वाली न बोल पाने के कारन इनके बच्चे गढ़वाली भाषा के ज्ञान से वंचित नहीं हो जायेंगे?
एक गुंडा भी जब फिल्म देखने जाता हैं तो वो हीरो के नज़रिए से फिल्म देखता हैं, ऐसे ही हम कितने अच्छे या बुरे है इसका फैसला हम नहीं और लोग करते हैं, और यहाँ पर हम अपने नज़रिए से गढ़वाल की स्थिति को देख कर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं. फर्क इतना हैं की आप minimum को देख रहे हैं और हम maximum को.
अच्छे भी हम ही हैं और बुरे भी हम ही हैं. मैं अपने आप को अच्छा समझता हूँ और आप मैं ही से शायद कई लोग बिलकुल विपरीत सोच रहे होंगे. गाँव मैं अगर एक आदमी शराब नहीं पिता और १० पीते हैं तो कोई बाहर का ब्यक्ति आकर क्या कहेगा? इस गाँव मैं कोई शराब नहीं पीता या इस गाँव मैं सारे शराबी हैं. जो उस गाँव मैं शराब नहीं पीता वो भी यही कहेगा और जो पीता हैं वोह भी यही कहेगा की यहाँ सब शराबी हैं. बहुमत को ही पार्थमिकता दी जाती है.

Saturday, May 8, 2010

गढ़वाल आर्थिक रूप से कमजोर हैं और पैसे की हर किसी को जरूरत हैं, अनाज की पैदावार भी दिन बा दिन कम होती ja रही हैं, ऐसे मैं एक गढ़वाली क्या करे..

दरअसल गढ़वाल मैं लोग जागरूक नहीं हैं, जागरूक लोग शहर मैं आने के बाद होते हैं लेकिंग naukri के chalte वोह गाँव मैं ja कर अपनी जागरूकता को इस्तेमाल नहीं कर पाते और गाँव के लोगों को बोल के किसी कार्य के लीये राज़ी करना बहुत मुश्किल हैं वोह सिर्फ अपने लिये या पैसे के लिये काम करेंगे, गाँव के लिये काम karne के लिये उनको तैयार करना मुश्किल हैं. वोह खाली बैठ कर समय बर्बाद करना उचित समझते हैं पर गाँव की प्रगति के लिये उन्हें सरकार से पैसे चाहिए फिर काम करेंगे.
गढ़वाली परिपक्व लोग सोचते हैं की उनका गढ़वाल आगे जाने की बजाये पीछे जाए, क्यूंकि आगे उन्हें गढ़वाल का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा हैं, अनेको सुख सुभिदाओं ke बावजूद वो खुश और संतुष्ट महसूस नहीं कर रहे हैं, आज घर घर मैं टीवी, डिश, सी दी प्लयेर हैं पर वो गाँव ke एक घर मैं इकठा होकर किसी फिल्म या नाटक को देखने का मज़ा अलग ही था, आने वाली फिल्म और देखि फिल्म ke बारे मैं पुरे हफ्ते चर्चे होते थे.
हर घर मैं गाय और भैंश हुआ करती थी, सड़कों पर चलने वाली एक एक बस का नंबर याद रहता था. दुल्हन को देखने ke लीये लोगों का ताँता लग जाता था और उसके रोने की आवाज़ की दुरी से उसके सुशिल होने का अंदाज़ा लगाया जाता था. गाँव मैं होने वाली शादी का खुमार एक महीने पहले से शुरू हो जाता था, विडियो और नाचाड का इंतज़ार बेसब्री से किया जाता था. होली दीवाली जैसे त्यौहार ke समीप आने की ख़ुशी को समेटने ke लीये दिलों मैं जगह कम पड जाया करती थी. कौथिग का जोश ख़तम होने का नाम नहीं leta था. दुकानों मैं बिकने वाली सब्जी अक्सर सड जाया करती थी और खरीदने वाला शर्म महसूस करता था की लोग क्या कहेंगे की दुकान से सब्जी खरीदनी पड rahi हैं
Everybody wants to get rid of his old mud house and want to build Concrete house like City houses, comparatively mud houses are colder in summer and hotter in winter to concrete house, but still they need concrete house why? Perhaps everybody knows the reason. Utensils which we earlier used to keep drinking water at home are made of Copper & Bronze which keeps water cold and makes healthy, but now days we are using steel and plastic utensils, by them how can you keep water cool. I can not deny that climate of Garhwal’s also changed but still it’s better than city.

Today most of garhwali’s including “Gram Pradhan” are selfish, they are not even thinking about their own village/State, in such condition country is far away. For any improvement, we first need to point out what needs to be improved. We are here just discussing issues and will forget soon. Some of us are not even establish in own life, some of us have our family’s responsibilities, some of us have no relation with our villages and there could so many reasons/excuses.


(Garhwal = Pauri Garhwal, Kumaon Garhwal, Chamoli Garhwal, Tihri Garhwal and all other District of Uttarakhand.)

Friday, May 7, 2010

Earlier Garhwalis are known for their Honesty, Hard Work, Respect, Dedication, Spirituality, Kindness, Bravery etc., even it’s alive still in out of garhwal, but scenario of garhwal is now changing day by day negatively, specially the living environment of garhwal is really getting bad to worse.

You can see children, youngster and mature persons are addicted to hard drink, Hashish, playing cards etc. Education standard is in worse condition, but it’s better in city areas of garhwal. You can imagine future of garhwal by this.

I don’t think any garhwali person who can afford staying out of garhwal want to stay in garhwal, but people who are staying out of garhwal since long time and not aware current environment of garhwal want to come back for rest of their life.

Exceptions are everywhere; there are still some villages that are maintaining their culture.
Yesterday one garhwali boy of our colony had fight with other non garhwali boy, the other boy's father was abusing that "You Garhwali peoples are like this like that".

Who was guilty in that fight nothing matters for me but each and every comment passed by that person was pinching me becoz he was blaming our whole community just becoz of that one guy.

Is one person of particular community represent his community for good and bad things?

In that situation what third person should do?

How to save our culture?

अपनी संस्कृति को जानने के लिए और बचाने के लिए हमें उस से जुड़ना पड़ेगा उसके साथ रहना पड़ेगा तभी जाके हम अपनी संस्कृति को जान पायेंगे और उसको बचा पायेंगे.
पर क्या अपनी संस्कृति के साथ जुड़े रह पाने के लिए हमारे पास मुलभुत सुभिधाये हैं, जैसे की उचित शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवाएँ, परिवहन साधन, पूर्ण आहार इत्यादी! शायद हम इसका जवाब ईमानदारी से दे तो शायद "नहीं" होगा.

जब एक परिवार अपनी संस्कृति से दूर रहे किसी भी वजह से चाहे शिक्षा हो या रोज़गार, ऐसे हालात मैं उसके बच्चे अपनी संकृति को नहीं पहचान पायेंगे तो बचायेंगे किसे?

Tuesday, May 4, 2010

गफलत

अपना दिमाग और दुसरे का पैसा हर किसी को ज्यादा ही लगता हैं.
कई गढ़वाली भाई एक दुसरे को देख नहीं सकते और कई सिर्फ गढ़वाली होने के नाते ही उसकी हद से ज्यादा मदद करते हैं इसके पीछे क्या कारण हो सकता हैं,
क्या गढ़वाली चालक हो रहे हैं या यूँ कहे की चालाकी मैं अपना और अपने गढ़वाली भाइयों का नुकसान कर रहे हैं और अपने राज्य का नाम बदनाम कर रहे हैं.
जलन और द्वेष की भावना गढ़वालियों के अन्दर बदती जा रही हैं जिसके चलते वोह अच्छे बुरे और अपने पराये का भेद भूल कर दोनों का नुकसान कर रहे हैं.
पर्तिस्पर्धा के इस दौर मैं सफल न होने के कारन और अपने परिवार को और अपने को आगे बदने के चक्कर मैं वोह गलत कदम उठा देते हैं.
सफलता के गुरुर मैं गढ़वाली अपने से कमजोर गढ़वाली को अपना भाई मानने पर लज्जित महसूस करता हैं.

इस सब के पीछे असल क्या वजह हैं न तो मैं समझ पा रहा हूँ और ना ही जो समझ मैं आ रहा हैं उसको शब्दों मैं व्यक्त कर पा रहा हूँ....

बलि प्रथा

बलि प्रथा को मैं भी उचित नहीं समझता पर आप इस से इंकार नहीं कर सकते की इसका कोई औचित्य नहीं हैं.
गाँव में कई बार जागर मैं जाकर मैंने देवी देवताओं या भूतों को बलि की मांग करते सुना हैं, तो क्या जागर मैं नाचने वाले सब पाखंडी होते हैं जो बलि की मांग करते हैं?
बलि की मांग होने पर और न देने पर परिवार मैं होने वाली किसी भी घटना को आशंका की दृष्टि से देखा जाएगा.
बलि दिए जाने के मामले में कभी किसी भी देवी देवता ने यह नहीं कहा की मुझे बलि नहीं चाहिए थी, लेकिन यह जरूर कहा हैं की पूजा उचित तरीके न होने के कारन आपका कार्य संपन्न नहीं हुआ.

Monday, April 26, 2010

गढ़वाल मैं उत्पन्न होती समस्याएँ

जैसे जैसे गढ़वाल उन्नति कर रहा है (इसे आप अवन्नती भी कह सकते है) दिन प्रति दिन नयी नयी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है जो आगे चल कर एक भयंकर रूप धारण कर सकती है. जैसे की :-
जल संकट, घरेलु सब्जियों का आभाव, वनों मैं वृक्षों का आभाव, पशुओं के चारे का आभाव, खेती से उत्पन्न होने वाले अनाज में निरंतर गिरावट, ईधन के लिये लकडियो का आभाव

उपरोक्त सभी ऐसी समस्याएँ हैं जिनका बिना गढ़वाल अपना वजूद खो देगा.

अधिकतर गाँव मैं जल संकट चरम सीमा पर पहुँच चूका हैं, छोटी मोती नदियाँ तो अब केवल बरसात के मौसम मैं ही नज़र आती हैं. (बिन पानी सब सून).
घरों मैं पशुओं के चारे के आभाव मैं लोगों ने पशुपालन धीरे चीरे बंद कर दिया हैं, भैंसे पालना तो हाथी पालने जैसे होता जा रहा हैं केवल चारे के आभाव के कारण.
घरों मैं ईधन के लिये लकड़ियों के आभाव के कारण गैस का प्रचलन बढता ही जा रहा हैं जिससे चूल्हे की रोटी का स्वाद नहीं मिल पता.
जल्वायुं परिवर्तन भी काफी हद तक महानगरों के सामान होता जा रहा हैं.

सुधार के लिये कमियों का पता होना जरूरी है

Sunday, April 25, 2010

कुछ लहरें जल्दी शांत नहीं होती...

गढ़वाल की शैतानी आपदाओं जैसे अहंकार, घात, नज़र, धुल, हवा इत्यादि से हर गढ़वाली त्रस्त हैं, किसी के बुरा चाहने से और बुरा करने से बुरा तो हो जाता हैं पर शायद भला चाहने या करने से ऐसा कुछ नहीं होता. वास्तविकता क्या है इस से तो शायद ही कोई अवगत होगा लेकिन मानने से कोई इंकार नहीं करेगा और सचाई कोई जानने किस कोशिश नहीं करता की आखिर यह सब क्या होता हैं और कैसे असर करता हैं. रीति चली आ रही हैं और सब उसका पालन कर रहे हैं, लोग त्रस्त हैं और त्रस्त ही रहेंगे शायद, समाधान खोजने वाले तो नहीं हैं पर इलाज का दावा करने वालों की भी कमी नहीं हैं, अनेक प्रकार के बक्या/बाबा गढ़वाल मैं मौजूद हैं और लगे हुए हैं ऐसी आपदाओं से लोगों को मुक्ति देने पर. आपको क्या लगता हैं की यह एक ऐसा मुद्दा हैं जिसके ऊपर हम सोच नहीं सकते या सोचना नहीं चाहते या फिर कितना भी सोच लो इन बातों का कोई समाधान नहीं हैं, समाज कितना भी बदल जाए पर हम इन चीजों को नहीं बदल सकते, यह आदि से चल रहा हैं और अनंत तक चलता रहेगा, यह चीजें सही गलत का भेद नहीं जानती. टोटल confusion है, हजारो सवाल उठते हैं, पर शायद जवाब मुश्किल हैं या शायद कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब नहीं होता.

Sunday, April 18, 2010

महानगर और गढ़वाल

कल मैं अपने दोस्त के साथ उसकी शादी के कार्ड बांटने गया तो मेरा कई गढ़वाली लोगों से परिचय हुआ जो की काफी समय से दिल्ली और आसपास के छेत्रों मैं बसे हुए हैं, गर्मी के ऊपर और दिल्ली के मौसम के साथ कई पहलुओं पर चर्चा हुयी और गढ़वाल की तुलना की गयी, जिसमें कुछ लोगो ने तो निश्चित कर रखा हैं की सर्विस पूरी होते ही वोह दुबारा अपने गाँव मैं जा कर बस जायेंगे और इस महानगरीय माहोल से छुट्टी पा के अपने स्वर्ग नुमा गढ़वाल मैं रहेंगे और बाकी की जिंदगी वही बिताएंगे. दिन बा दिन जिस तरह गढ़वाल का माहोल बदलता जा रहा हैं, लोगों मैं आपस मैं मतभेद बढता जा रहा हैं और गढ़वाल अपने आपको और अपनी मान्यताओं को जिस तरह खोने को आतुर हैं, ऐसी मैं आपको के लगता हैं, क्या गढ़वाल का माहोल आज भी पहले की तरह अनुकूल हैं, क्या गढ़वाल मैं दुबारा बसने का निर्णय उनका सही हैं ? अगर आप गढ़वाल मैं रहते हैं तो क्या महानगरों मैं बसना चाहते हैं और अगर आप महानगरों मैं हैं तो क्या अप्प गढ़वाल मैं बसना चाहते हैं?

Friday, April 16, 2010

गढ़वाली संगीत का भविष्य नेगी जी के बाद

नेगी जी हमेशा अपने गीतों के माध्यम से हमें गढ़वाल की वास्तिविकता बताते हैं, हमारी भावनाओं को गीतों मैं पिरो कर प्रस्तुत करते हैं इसीलिए हम सबके चहेते हैं. जैसे जैसे समाज बदलता जा रहा हैं और लोगों मैं एहसास और भावनायें बदलती जा रही हैं वो नेगी जी के गानों मैं आप सुन कर महसूस कर सकते हैं. जैसे की "नया जमाना का छोरों कण उठी बोल, तिबारी दंद्ल्यालामा रोक न रोल", "भीना रे बिल्यती भीना, टॉप टेई वाला भीना, मेरा चुडा बुखंडा खे की जा " और ऐसे ही कई अन्य गाने हैं जो की आज के गढ़वाली व्यक्ति के मनोभावों भावनाओ को दर्शाते हैं.

कल समाज कोई और नया रंग लेके आएगा, नयी भावनाए होंगी और कोई नया गायक उन भावनाओ को अपने गीतों मैं उकेरेगा, शायद नेगी जी जैसा सक्षम न हो, पर अच्छी कोशिश को सराहा जाएगा जैसा की नेगी जी के साथ हो रहाहैं.

Friday, March 26, 2010

गढ़वाल मैं देवी देवताओं की भूमिका

गढ़वाल देवी देवताओं की शरान्स्थ्ली हैं और यहाँ के निवासियों का कोई भी कार्य बिना देवी देवताओं के बिना सम्पूर्ण नहीं होता! एक बार अगर आपने गढ़वाल की जन्मभूमि पर जनम ले लिया तो आप कहीं भी चले जाए, आप अपने देवी देवताओं से मुख नहीं मोड़ सकते, वो हर अच्छे बुरे काम मैं आपको अपना एहसास करते रहेंगे, चाहे और अनचाहे!

गढ़वाल की विसंगतियां

जब से मैंने होश संभाला हैं तभी से हम "अहंकार", "फिटकार", "घात" "नज़र" और ऐसे ही कई अनगिनत बातों के बारे मैं सुनते आये हैं, वास्तविकता क्या हैं इसका पता मुझे अभी भी नहीं पता, लेकिन गढ़वाल मैं शायद ही कोई ऐसा इन्सान होगा जो इनसे वंचित हो, किसी न किसी रूप मैं हर कोई इन आपदाओं से त्रस्त हैं आज भी अधिकतर लोग बीमार होने पर डॉक्टर के पास बाद मैं जाते हैं पहले बीमारी का सम्बन्ध उपरोक्त बातों से जोड़ते हैं और घरेलु नुस्के अपनाते हैं,

हर असफलता का मतलब सीधे सीधे किसी उपरोक्त आपदाओं से जोड़ा जाता हैं, हर दुसरे दिन एक नए "पुछेरे" या "बकया" का जनम होता हैं और अगर आप उनके पास जाए तो कोई न कोई आपदा आप पर जरूर निकलेगी. और यह सब एक गढ़वाली द्वारा दुसरे गढ़वाली पर किया जाता है.

नरेंद्र सिंह नेगी जी के बाद

नेगी जी हमेशा अपने गीतों के माध्यम से हमें गढ़वाल की वास्तिविकता बताते हैं, हमारी भावनाओं को गीतों मैं पिरो कर प्रस्तुत करते हैं इसीलिए हम सबके चहेते हैं. जैसे जैसे समाज बदलता जा रहा हैं और लोगों मैं एहसास और भावनायें बदलती जा रही हैं वो नेगी जी के गानों मैं आप सुन कर महसूस कर सकते हैं. जैसे की "नया जमाना का छोरों कण उठी बोल, तिबारी दंद्ल्यालामा रोक न रोल", "भीना रे बिल्यती भीना, टॉप टेई वाला भीना, मेरा चुडा बुखंडा खे की जा " और ऐसे ही कई अन्य गाने हैं जो की आज के गढ़वाली व्यक्ति के मनोभावों भावनाओ को दर्शाते हैं.

कल समाज कोई और नया रंग लेके आएगा, नयी भावनाए होंगी और कोई नया गायक उन भावनाओ को अपने गीतों मैं उकेरेगा, शायद नेगी जी जैसा सक्षम न हो, पर अच्छी कोशिश को सराहा जाएगा जैसा की नेगी जी के साथ हो रहा हैं.

गढ़वाल मेरी नज़र से

दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत उन लोगों पर बिलकुल सटीक बैठती हैं जो गढ़वाली होते हुए भी गढ़वाल मैं पैदा नहीं हुए और चाहते हैं की गढ़वाल मैं रह सके.
गढ़वाल एक pure गढ़वाली की नज़र से:-
रिश्ते गाँव मैं बस नाम के रह गए हैं, गाँव मैं हर कोई एक दुसरे से द्वेष रख रहा हैं, महिलाए खेती करने मैं परेशानियाँ महसूस करती हैं और एक मजबूरी मैं काम करती हुयी सी परतीत होती हैं, इंसान अपने दुःख से दुखी न हो कर दुसरे के सुख से दुखी हैं वाली भावना आप हर व्यक्ति से महसूस कर सकते हैं. पुरुष का काम केवल ताश खेलना और दारु पीने तक ही सिमित हैं, राजनैतिक पार्टियों मैं भी अब उसकी शिरकत बदती जा रही हैं जो की धीरे धीरे धीरे एक भयंकर रूप लेता जा रहा हैं, गाँव प्रधान के लीये ही लोग इतना पैसा बहा रहे हैं की जिसकी कोई सीमा नहीं हैं, पैसा बहा के प्रधान बनने के पीछे क्या मकसद होता हैं, शायद आप जानते ही होंगे, हर कोई स्वार्थी होता जा रहा हैं, लड़के गुंडा गर्दी मैं बड़ते ही जा रहे हैं, आये दिन आप स्कूल कोल्लाजे मैं होने वाली घटनाओ को सुन सकते हैं और यह घटनायें मेलों मैं भयंकर रूप ले लेती हैं, गढ़वाल का युवा महज १० साल का होने पर ही बीडी सिगरेट दारु भंग का आदि हो चूका हैं, गढ़वाल की लड़कियां भी फैशन की दौर मैं किसी से भी पीछे नहीं हैं, हर दूसरी लड़की का आप किसी न किसी से प्रेम प्रसंग देख सकते हैं. स्कूल मैं पढाई का स्टार बहुत ही निम्न हैं, जिसकी वजह से युवा अपने आप को किसी काबिल नहीं समझता और अपने पढ़े लिखे होने पर भी हीनता का शिकार होता हैं, और जिंदगी भर एक अच्छी नौकरी के लीये भागता रहता हैं.

आज की तारिक मैं हमारे पास पहाड़ों के रूप मैं सौन्दर्य हैं लेकिन उनको देखने वाली आँखें नहीं हैं, खेत हैं लेकिन उनपर मेहनत करके अनाज उगने की ताकत कम होती जा रही हैं.
लेकिन इन सब के बावजूद अपनापन फिर भी महसूस होता हैं, इंसानियत लोंगों मैं अभी बाकी हैं, गढ़वालिन अपने आप को गढ़वाली मैं ही स्वस्थ महसूस करता हैं.

(मेरी यह भावनायें अपनी हैं, शायद कुछ अच्छी हों कुछ बुरी )