Friday, March 26, 2010

गढ़वाल मैं देवी देवताओं की भूमिका

गढ़वाल देवी देवताओं की शरान्स्थ्ली हैं और यहाँ के निवासियों का कोई भी कार्य बिना देवी देवताओं के बिना सम्पूर्ण नहीं होता! एक बार अगर आपने गढ़वाल की जन्मभूमि पर जनम ले लिया तो आप कहीं भी चले जाए, आप अपने देवी देवताओं से मुख नहीं मोड़ सकते, वो हर अच्छे बुरे काम मैं आपको अपना एहसास करते रहेंगे, चाहे और अनचाहे!

गढ़वाल की विसंगतियां

जब से मैंने होश संभाला हैं तभी से हम "अहंकार", "फिटकार", "घात" "नज़र" और ऐसे ही कई अनगिनत बातों के बारे मैं सुनते आये हैं, वास्तविकता क्या हैं इसका पता मुझे अभी भी नहीं पता, लेकिन गढ़वाल मैं शायद ही कोई ऐसा इन्सान होगा जो इनसे वंचित हो, किसी न किसी रूप मैं हर कोई इन आपदाओं से त्रस्त हैं आज भी अधिकतर लोग बीमार होने पर डॉक्टर के पास बाद मैं जाते हैं पहले बीमारी का सम्बन्ध उपरोक्त बातों से जोड़ते हैं और घरेलु नुस्के अपनाते हैं,

हर असफलता का मतलब सीधे सीधे किसी उपरोक्त आपदाओं से जोड़ा जाता हैं, हर दुसरे दिन एक नए "पुछेरे" या "बकया" का जनम होता हैं और अगर आप उनके पास जाए तो कोई न कोई आपदा आप पर जरूर निकलेगी. और यह सब एक गढ़वाली द्वारा दुसरे गढ़वाली पर किया जाता है.

नरेंद्र सिंह नेगी जी के बाद

नेगी जी हमेशा अपने गीतों के माध्यम से हमें गढ़वाल की वास्तिविकता बताते हैं, हमारी भावनाओं को गीतों मैं पिरो कर प्रस्तुत करते हैं इसीलिए हम सबके चहेते हैं. जैसे जैसे समाज बदलता जा रहा हैं और लोगों मैं एहसास और भावनायें बदलती जा रही हैं वो नेगी जी के गानों मैं आप सुन कर महसूस कर सकते हैं. जैसे की "नया जमाना का छोरों कण उठी बोल, तिबारी दंद्ल्यालामा रोक न रोल", "भीना रे बिल्यती भीना, टॉप टेई वाला भीना, मेरा चुडा बुखंडा खे की जा " और ऐसे ही कई अन्य गाने हैं जो की आज के गढ़वाली व्यक्ति के मनोभावों भावनाओ को दर्शाते हैं.

कल समाज कोई और नया रंग लेके आएगा, नयी भावनाए होंगी और कोई नया गायक उन भावनाओ को अपने गीतों मैं उकेरेगा, शायद नेगी जी जैसा सक्षम न हो, पर अच्छी कोशिश को सराहा जाएगा जैसा की नेगी जी के साथ हो रहा हैं.

गढ़वाल मेरी नज़र से

दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत उन लोगों पर बिलकुल सटीक बैठती हैं जो गढ़वाली होते हुए भी गढ़वाल मैं पैदा नहीं हुए और चाहते हैं की गढ़वाल मैं रह सके.
गढ़वाल एक pure गढ़वाली की नज़र से:-
रिश्ते गाँव मैं बस नाम के रह गए हैं, गाँव मैं हर कोई एक दुसरे से द्वेष रख रहा हैं, महिलाए खेती करने मैं परेशानियाँ महसूस करती हैं और एक मजबूरी मैं काम करती हुयी सी परतीत होती हैं, इंसान अपने दुःख से दुखी न हो कर दुसरे के सुख से दुखी हैं वाली भावना आप हर व्यक्ति से महसूस कर सकते हैं. पुरुष का काम केवल ताश खेलना और दारु पीने तक ही सिमित हैं, राजनैतिक पार्टियों मैं भी अब उसकी शिरकत बदती जा रही हैं जो की धीरे धीरे धीरे एक भयंकर रूप लेता जा रहा हैं, गाँव प्रधान के लीये ही लोग इतना पैसा बहा रहे हैं की जिसकी कोई सीमा नहीं हैं, पैसा बहा के प्रधान बनने के पीछे क्या मकसद होता हैं, शायद आप जानते ही होंगे, हर कोई स्वार्थी होता जा रहा हैं, लड़के गुंडा गर्दी मैं बड़ते ही जा रहे हैं, आये दिन आप स्कूल कोल्लाजे मैं होने वाली घटनाओ को सुन सकते हैं और यह घटनायें मेलों मैं भयंकर रूप ले लेती हैं, गढ़वाल का युवा महज १० साल का होने पर ही बीडी सिगरेट दारु भंग का आदि हो चूका हैं, गढ़वाल की लड़कियां भी फैशन की दौर मैं किसी से भी पीछे नहीं हैं, हर दूसरी लड़की का आप किसी न किसी से प्रेम प्रसंग देख सकते हैं. स्कूल मैं पढाई का स्टार बहुत ही निम्न हैं, जिसकी वजह से युवा अपने आप को किसी काबिल नहीं समझता और अपने पढ़े लिखे होने पर भी हीनता का शिकार होता हैं, और जिंदगी भर एक अच्छी नौकरी के लीये भागता रहता हैं.

आज की तारिक मैं हमारे पास पहाड़ों के रूप मैं सौन्दर्य हैं लेकिन उनको देखने वाली आँखें नहीं हैं, खेत हैं लेकिन उनपर मेहनत करके अनाज उगने की ताकत कम होती जा रही हैं.
लेकिन इन सब के बावजूद अपनापन फिर भी महसूस होता हैं, इंसानियत लोंगों मैं अभी बाकी हैं, गढ़वालिन अपने आप को गढ़वाली मैं ही स्वस्थ महसूस करता हैं.

(मेरी यह भावनायें अपनी हैं, शायद कुछ अच्छी हों कुछ बुरी )