Friday, March 26, 2010

गढ़वाल मेरी नज़र से

दूर के ढोल सुहावने वाली कहावत उन लोगों पर बिलकुल सटीक बैठती हैं जो गढ़वाली होते हुए भी गढ़वाल मैं पैदा नहीं हुए और चाहते हैं की गढ़वाल मैं रह सके.
गढ़वाल एक pure गढ़वाली की नज़र से:-
रिश्ते गाँव मैं बस नाम के रह गए हैं, गाँव मैं हर कोई एक दुसरे से द्वेष रख रहा हैं, महिलाए खेती करने मैं परेशानियाँ महसूस करती हैं और एक मजबूरी मैं काम करती हुयी सी परतीत होती हैं, इंसान अपने दुःख से दुखी न हो कर दुसरे के सुख से दुखी हैं वाली भावना आप हर व्यक्ति से महसूस कर सकते हैं. पुरुष का काम केवल ताश खेलना और दारु पीने तक ही सिमित हैं, राजनैतिक पार्टियों मैं भी अब उसकी शिरकत बदती जा रही हैं जो की धीरे धीरे धीरे एक भयंकर रूप लेता जा रहा हैं, गाँव प्रधान के लीये ही लोग इतना पैसा बहा रहे हैं की जिसकी कोई सीमा नहीं हैं, पैसा बहा के प्रधान बनने के पीछे क्या मकसद होता हैं, शायद आप जानते ही होंगे, हर कोई स्वार्थी होता जा रहा हैं, लड़के गुंडा गर्दी मैं बड़ते ही जा रहे हैं, आये दिन आप स्कूल कोल्लाजे मैं होने वाली घटनाओ को सुन सकते हैं और यह घटनायें मेलों मैं भयंकर रूप ले लेती हैं, गढ़वाल का युवा महज १० साल का होने पर ही बीडी सिगरेट दारु भंग का आदि हो चूका हैं, गढ़वाल की लड़कियां भी फैशन की दौर मैं किसी से भी पीछे नहीं हैं, हर दूसरी लड़की का आप किसी न किसी से प्रेम प्रसंग देख सकते हैं. स्कूल मैं पढाई का स्टार बहुत ही निम्न हैं, जिसकी वजह से युवा अपने आप को किसी काबिल नहीं समझता और अपने पढ़े लिखे होने पर भी हीनता का शिकार होता हैं, और जिंदगी भर एक अच्छी नौकरी के लीये भागता रहता हैं.

आज की तारिक मैं हमारे पास पहाड़ों के रूप मैं सौन्दर्य हैं लेकिन उनको देखने वाली आँखें नहीं हैं, खेत हैं लेकिन उनपर मेहनत करके अनाज उगने की ताकत कम होती जा रही हैं.
लेकिन इन सब के बावजूद अपनापन फिर भी महसूस होता हैं, इंसानियत लोंगों मैं अभी बाकी हैं, गढ़वालिन अपने आप को गढ़वाली मैं ही स्वस्थ महसूस करता हैं.

(मेरी यह भावनायें अपनी हैं, शायद कुछ अच्छी हों कुछ बुरी )

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