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Showing posts from April, 2010

गढ़वाल मैं उत्पन्न होती समस्याएँ

जैसे जैसे गढ़वाल उन्नति कर रहा है (इसे आप अवन्नती भी कह सकते है) दिन प्रतिदिन नयी नयी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है, जो आगे चल कर एक भयंकर रूप धारण कर सकती है, जैसे की :जल संकट, घरेलु सब्जियों का अभाव, वनों मैं वृक्षों का अभाव, पशुओं के चारे का अभाव, खेती से उत्पन्न होने वाले अनाज में निरंतर गिरावट, ईधन के लिये लकडियो का अभावउपरोक्त सभी ऐसी समस्याएँ हैं जिनके बिना गढ़वाल अपना वजूद खो देगा।अधिकतर गाँव मैं जल संकट चरम सीमा पर पहुँच चूका हैं, छोटी मोटी नदियाँ तो अब केवल बरसात के मौसम मैं ही नज़र आती हैं. (बिन पानी सब सून).घरों मैं पशुओं के चारे के अभाव मैं लोगों ने पशुपालन धीरे धीरे बंद कर दिया हैं, भैंसे पालना तो हाथी पालने जैसे होता जा रहा हैं केवल चारे के अभाव के कारण।घरों मैं ईधन के लिये लकड़ियों के अभाव के कारण गैस का प्रचलन बढता ही जा रहा हैं जिससे चूल्हे की रोटी का स्वाद विलुप्त की कगार तक पहुचने वाला है।जलवायु परिवर्तन भी काफी हद तक महानगरों के सामान होता जा रहा हैं।सुधार तभी संभव है जब हमें कमियों के पता होगा।

कुछ लहरें जल्दी शांत नहीं होती...

गढ़वाल की शैतानी आपदाओं जैसे अहंकार, घात, नज़र, धुल, हवा इत्यादि से हर गढ़वाली त्रस्त हैं, किसी के बुरा चाहने से और बुरा करने से बुरा तो हो जाता हैं पर शायद भला चाहने या करने से ऐसा कुछ नहीं होता. वास्तविकता क्या है इस से तो शायद ही कोई अवगत होगा लेकिन मानने से कोई इंकार नहीं करेगा और सचाई कोई जानने किस कोशिश नहीं करता की आखिर यह सब क्या होता हैं और कैसे असर करता हैं. रीति चली आ रही हैं और सब उसका पालन कर रहे हैं, लोग त्रस्त हैं और त्रस्त ही रहेंगे शायद, समाधान खोजने वाले तो नहीं हैं पर इलाज का दावा करने वालों की भी कमी नहीं हैं, अनेक प्रकार के बक्या/बाबा गढ़वाल मैं मौजूद हैं और लगे हुए हैं ऐसी आपदाओं से लोगों को मुक्ति देने पर. आपको क्या लगता हैं की यह एक ऐसा मुद्दा हैं जिसके ऊपर हम सोच नहीं सकते या सोचना नहीं चाहते या फिर कितना भी सोच लो इन बातों का कोई समाधान नहीं हैं, समाज कितना भी बदल जाए पर हम इन चीजों को नहीं बदल सकते, यह आदि से चल रहा हैं और अनंत तक चलता रहेगा, यह चीजें सही गलत का भेद नहीं जानती. टोटल confusion है, हजारो सवाल उठते हैं, पर शायद जवाब मुश्किल हैं या शायद कुछ सवा…

महानगर और गढ़वाल

कल अपने दोस्त के साथ उसकी शादी के कार्ड बांटने निकला तो कई नए गढ़वाली लोगों से परिचय हुआ जो की काफी समय से दिल्ली और आसपास के छेत्रों मैं बसे हुए हैं, गर्मी के ऊपर और दिल्ली के मौसम के साथ कई पहलुओं पर चर्चा हुयी और शहर के साथ गढ़वाल की तुलना की गयी, जिसमें कुछ लोगो ने तो निश्चित कर रखा हैं की रिटायर होते ही वो दुबारा अपने गाँव मैं जा कर बस जायेंगे और इस महानगर के नरकीय माहोल से छुट्टी पा के अपने स्वर्गनुमा गढ़वाल मैं रहेंगे और बाकी की जिंदगी वही बिताएंगे. दिन बा दिन जिस तरह गढ़वाल का माहोल बदलता जा रहा हैं, लोगों मैं आपसी मेलमिलाप घटता जा रहा है हैं और गढ़वाल अपनी मान्यताओं को जिस तरह खोने को आतुर हैं, ऐसी मैं क्या लगता हैं, गढ़वाल का माहोल क्या आज भी पहले की तरह अनुकूल हैं, क्या गढ़वाल मैं दुबारा बसने का उनका निर्णय क्या सही साबित होगा?