Monday, April 26, 2010

गढ़वाल मैं उत्पन्न होती समस्याएँ

जैसे जैसे गढ़वाल उन्नति कर रहा है (इसे आप अवन्नती भी कह सकते है) दिन प्रति दिन नयी नयी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है जो आगे चल कर एक भयंकर रूप धारण कर सकती है. जैसे की :-
जल संकट, घरेलु सब्जियों का आभाव, वनों मैं वृक्षों का आभाव, पशुओं के चारे का आभाव, खेती से उत्पन्न होने वाले अनाज में निरंतर गिरावट, ईधन के लिये लकडियो का आभाव

उपरोक्त सभी ऐसी समस्याएँ हैं जिनका बिना गढ़वाल अपना वजूद खो देगा.

अधिकतर गाँव मैं जल संकट चरम सीमा पर पहुँच चूका हैं, छोटी मोती नदियाँ तो अब केवल बरसात के मौसम मैं ही नज़र आती हैं. (बिन पानी सब सून).
घरों मैं पशुओं के चारे के आभाव मैं लोगों ने पशुपालन धीरे चीरे बंद कर दिया हैं, भैंसे पालना तो हाथी पालने जैसे होता जा रहा हैं केवल चारे के आभाव के कारण.
घरों मैं ईधन के लिये लकड़ियों के आभाव के कारण गैस का प्रचलन बढता ही जा रहा हैं जिससे चूल्हे की रोटी का स्वाद नहीं मिल पता.
जल्वायुं परिवर्तन भी काफी हद तक महानगरों के सामान होता जा रहा हैं.

सुधार के लिये कमियों का पता होना जरूरी है

Sunday, April 25, 2010

कुछ लहरें जल्दी शांत नहीं होती...

गढ़वाल की शैतानी आपदाओं (अहंकार, घात, नज़र, धुल, हवा इत्यादि) से हर गढ़वाली त्रस्त हैं, किसी के बुरा चाहने से और बुरा करने से किसी का बुरा हो जाता हैं पर शायद भला करने के लिए ऐसा कुछ नहीं हैं! वास्तविकता से तो शायद ही कोई अवगत होगा लेकिंग मानने से कोई इंकार नहीं करेगा और सचाई कोई जानना नहीं चाहता की आखिर यह सब क्या होता हैं और कैसे असर करता हैं. रीति चली आ रही हैं और सब उसका पालन कर रहे हैं, लोग त्रस्त हैं और त्रस्त ही रहेंगे शायद, समाधान खोजने वाले तो नहीं हैं पर इलाज करने वालों की कमी नहीं हैं, अनेक प्रकार के बाबा गढ़वाल मैं मौजूद हैं और लगे हुए हैं ऐसी आपदाओं से लोगों को मुक्ति देने पर.

आपको क्या लगता हैं की यह एक ऐसा मुद्दा हैं जिसके ऊपर हम सोच नहीं सकते या सोचना नहीं चाहते या फिर कितना भी सोच लो इन बातों का कोई समाधान नहीं हैं. समाज कितना भी बदल जाए पर हम इन चीजों को नहीं बदल सकते, यह आदि से चल रहा हैं और अनंत तक चलता रहेगा. यह चीजें सही गलत का भेद नहीं जानती,

टोटल confusion है, हजारो सवाल उठते हैं, पर शायद जवाब मुश्किल हैं या शायद कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनका जवाब नहीं होता.................

Tuesday, April 20, 2010

गढ़वाली चिट्ठी


राम का लैटर सीता के लिए गढ़वाली में
म्येरी सीता,
मैं यख राजी ख़ुशी से छौं, और नर्सिंग किरपा से तू भी ठीक ही होली,
एक यू लक्छ्मण मेरा दगड साला रात भर परेशान कनु मै तें, छोरयुं कि रट लगायी येकी
मेरी बुद्धि तें भ्रष्ट कनु , अर सुण मेरी बात ध्यान लगेई कन
ये हनुमान बांदरम मैंन चिट्ठी अर काफल छिन मेरा दियां गणी ते ,एक भी कम व्हालू , तू मैं ते तुरंत फ़ोन कर दयेई...ये बांद्रे पुछेडी फूक देयेलु मैं ......और अगर तेरा फ़ोन माँ पैसा नि व्हाला मिस कॉल कर दई, मैं वापस फ़ोन कालू त्वेते ..तू मेरी चिंता करी ..
और ते कमीना रावण ते ब्वोली दे की मेरा जवें तू ख़तम कन..देख ले तू
मेरी सीता तू बिलकुल चिंता करी त्यारा सास सुसुर ठीक ठाक छिन ...
अछा म्येरी सीता अब मेरा पेने रिफिल ख़तम व्हेगी ..तू अप्डू ख्याल राखी ...
घणघोर जंगल बटे
त्यारु जंवे राम

Sunday, April 18, 2010

महानगर और गढ़वाल

कल मैं अपने दोस्त के साथ उसकी शादी के कार्ड बांटने गया तो मेरा कई गढ़वाली लोगों से परिचय हुआ जो की काफी समय से दिल्ली और आसपास के छेत्रों मैं बसे हुए हैं, गर्मी के ऊपर और दिल्ली के मौसम के साथ कई पहलुओं पर चर्चा हुयी और गढ़वाल की तुलना की गयी, जिसमें कुछ लोगो ने तो निश्चित कर रखा हैं की सर्विस पूरी होते ही वोह दुबारा अपने गाँव मैं जा कर बस जायेंगे और इस महानगरीय माहोल से छुट्टी पा के अपने स्वर्ग नुमा गढ़वाल मैं रहेंगे और बाकी की जिंदगी वही बिताएंगे. दिन बा दिन जिस तरह गढ़वाल का माहोल बदलता जा रहा हैं, लोगों मैं आपस मैं मतभेद बढता जा रहा हैं और गढ़वाल अपने आपको और अपनी मान्यताओं को जिस तरह खोने को आतुर हैं, ऐसी मैं आपको के लगता हैं, क्या गढ़वाल का माहोल आज भी पहले की तरह अनुकूल हैं, क्या गढ़वाल मैं दुबारा बसने का निर्णय उनका सही हैं ? अगर आप गढ़वाल मैं रहते हैं तो क्या महानगरों मैं बसना चाहते हैं और अगर आप महानगरों मैं हैं तो क्या अप्प गढ़वाल मैं बसना चाहते हैं?

Friday, April 16, 2010

गढ़वाली संगीत का भविष्य नेगी जी के बाद

नेगी जी हमेशा अपने गीतों के माध्यम से हमें गढ़वाल की वास्तिविकता बताते हैं, हमारी भावनाओं को गीतों मैं पिरो कर प्रस्तुत करते हैं इसीलिए हम सबके चहेते हैं. जैसे जैसे समाज बदलता जा रहा हैं और लोगों मैं एहसास और भावनायें बदलती जा रही हैं वो नेगी जी के गानों मैं आप सुन कर महसूस कर सकते हैं. जैसे की "नया जमाना का छोरों कण उठी बोल, तिबारी दंद्ल्यालामा रोक न रोल", "भीना रे बिल्यती भीना, टॉप टेई वाला भीना, मेरा चुडा बुखंडा खे की जा " और ऐसे ही कई अन्य गाने हैं जो की आज के गढ़वाली व्यक्ति के मनोभावों भावनाओ को दर्शाते हैं.

कल समाज कोई और नया रंग लेके आएगा, नयी भावनाए होंगी और कोई नया गायक उन भावनाओ को अपने गीतों मैं उकेरेगा, शायद नेगी जी जैसा सक्षम न हो, पर अच्छी कोशिश को सराहा जाएगा जैसा की नेगी जी के साथ हो रहाहैं.