Monday, May 10, 2010

हर गढ़वाली के मन मैं अपने गढ़वाल की बहुत से यादें बसी हैं जो की उसे गढ़वाली होने पर गर्वान्वित कराती हैं. सिर्फ रोज़गार के लीये उसे अपना गाँव छोडना पड़ा और शहर का रुख करना पड़ा, यहाँ आ कर मुश्किल हालातों से जूझते हुए अपने आप को इस शहर के अनुकूल ढाला, जिसमे बहुत से कठिन हालातों से गुजरना पड़ा, और शायद अब चाहता हैं की जैसे हालत उसने झेले हैं वह उसके बच्चों को न झेलने पड़े.
जमाना बदल रहा हैं और ज़माने के साथ सब कुछ बदल रहा है, ज़माने के साथ अगर कदम मिला सको तो शायद अपना अस्तित्व बचा सको नहीं तो विलुप्त होने में कोई देर नहीं लगती. शहर की तुलना मैं हमारा गढ़वाल काफी अच्छा है, लेकिन दिन प्रति दिन शहर गढ़वाल पर हावी हो रहा हैं.पानी गाँव मैं उपलब्द नहीं हैं लेकिन कोल्ड ड्रिंक्स का नवीन फ्लेवर हर जगह मिल जाएगा.
गढ़वाल और इसके लोगों मैं अभी अपनापन जिन्दा हैं लेकिन अगर आप महसूस करे तो पायेंगे की लोग गढ़वाल मैं अपनी जड़े मजबूत करने की तुलना में उखाड़ ज्यादा रहे हैं.

मैं अभी तक एक भी ऐसे बच्चे से नहीं मिला हूँ जिसने की अपना बचपन शहर में बिताया हो या बिता रहा हैं उसको गढ़वाली भाषा का ज्ञान हो, वो समझ सकता हैं पर उसको बोल नहीं पाता, इसके पीछे वजह हैं की उसके सरंशक आपस मैं गढ़वाली मैं बातें करते हैं जिसकी वजह से उसको अपनी भाषा का केवल समझाने का ज्ञान हे, लेकिन जब यही बच्चे आगे चल कर अपनी नयी पीड़ी चलाएंगे और इनके गढ़वाली न बोल पाने के कारन इनके बच्चे गढ़वाली भाषा के ज्ञान से वंचित नहीं हो जायेंगे?
एक गुंडा भी जब फिल्म देखने जाता हैं तो वो हीरो के नज़रिए से फिल्म देखता हैं, ऐसे ही हम कितने अच्छे या बुरे है इसका फैसला हम नहीं और लोग करते हैं, और यहाँ पर हम अपने नज़रिए से गढ़वाल की स्थिति को देख कर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं. फर्क इतना हैं की आप minimum को देख रहे हैं और हम maximum को.
अच्छे भी हम ही हैं और बुरे भी हम ही हैं. मैं अपने आप को अच्छा समझता हूँ और आप मैं ही से शायद कई लोग बिलकुल विपरीत सोच रहे होंगे. गाँव मैं अगर एक आदमी शराब नहीं पिता और १० पीते हैं तो कोई बाहर का ब्यक्ति आकर क्या कहेगा? इस गाँव मैं कोई शराब नहीं पीता या इस गाँव मैं सारे शराबी हैं. जो उस गाँव मैं शराब नहीं पीता वो भी यही कहेगा और जो पीता हैं वोह भी यही कहेगा की यहाँ सब शराबी हैं. बहुमत को ही पार्थमिकता दी जाती है.

Saturday, May 8, 2010

गढ़वाल आर्थिक रूप से कमजोर हैं और पैसे की हर किसी को जरूरत हैं, अनाज की पैदावार भी दिन बा दिन कम होती ja रही हैं, ऐसे मैं एक गढ़वाली क्या करे..

दरअसल गढ़वाल मैं लोग जागरूक नहीं हैं, जागरूक लोग शहर मैं आने के बाद होते हैं लेकिंग naukri के chalte वोह गाँव मैं ja कर अपनी जागरूकता को इस्तेमाल नहीं कर पाते और गाँव के लोगों को बोल के किसी कार्य के लीये राज़ी करना बहुत मुश्किल हैं वोह सिर्फ अपने लिये या पैसे के लिये काम करेंगे, गाँव के लिये काम karne के लिये उनको तैयार करना मुश्किल हैं. वोह खाली बैठ कर समय बर्बाद करना उचित समझते हैं पर गाँव की प्रगति के लिये उन्हें सरकार से पैसे चाहिए फिर काम करेंगे.
गढ़वाली परिपक्व लोग सोचते हैं की उनका गढ़वाल आगे जाने की बजाये पीछे जाए, क्यूंकि आगे उन्हें गढ़वाल का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा हैं, अनेको सुख सुभिदाओं ke बावजूद वो खुश और संतुष्ट महसूस नहीं कर रहे हैं, आज घर घर मैं टीवी, डिश, सी दी प्लयेर हैं पर वो गाँव ke एक घर मैं इकठा होकर किसी फिल्म या नाटक को देखने का मज़ा अलग ही था, आने वाली फिल्म और देखि फिल्म ke बारे मैं पुरे हफ्ते चर्चे होते थे.
हर घर मैं गाय और भैंश हुआ करती थी, सड़कों पर चलने वाली एक एक बस का नंबर याद रहता था. दुल्हन को देखने ke लीये लोगों का ताँता लग जाता था और उसके रोने की आवाज़ की दुरी से उसके सुशिल होने का अंदाज़ा लगाया जाता था. गाँव मैं होने वाली शादी का खुमार एक महीने पहले से शुरू हो जाता था, विडियो और नाचाड का इंतज़ार बेसब्री से किया जाता था. होली दीवाली जैसे त्यौहार ke समीप आने की ख़ुशी को समेटने ke लीये दिलों मैं जगह कम पड जाया करती थी. कौथिग का जोश ख़तम होने का नाम नहीं leta था. दुकानों मैं बिकने वाली सब्जी अक्सर सड जाया करती थी और खरीदने वाला शर्म महसूस करता था की लोग क्या कहेंगे की दुकान से सब्जी खरीदनी पड rahi हैं
Everybody wants to get rid of his old mud house and want to build Concrete house like City houses, comparatively mud houses are colder in summer and hotter in winter to concrete house, but still they need concrete house why? Perhaps everybody knows the reason. Utensils which we earlier used to keep drinking water at home are made of Copper & Bronze which keeps water cold and makes healthy, but now days we are using steel and plastic utensils, by them how can you keep water cool. I can not deny that climate of Garhwal’s also changed but still it’s better than city.

Today most of garhwali’s including “Gram Pradhan” are selfish, they are not even thinking about their own village/State, in such condition country is far away. For any improvement, we first need to point out what needs to be improved. We are here just discussing issues and will forget soon. Some of us are not even establish in own life, some of us have our family’s responsibilities, some of us have no relation with our villages and there could so many reasons/excuses.


(Garhwal = Pauri Garhwal, Kumaon Garhwal, Chamoli Garhwal, Tihri Garhwal and all other District of Uttarakhand.)

Friday, May 7, 2010

How to save our culture?

अपनी संस्कृति को जानने के लिए और बचाने के लिए हमें उस से जुड़ना पड़ेगा उसके साथ रहना पड़ेगा तभी जाके हम अपनी संस्कृति को जान पायेंगे और उसको बचा पायेंगे.
पर क्या अपनी संस्कृति के साथ जुड़े रह पाने के लिए हमारे पास मुलभुत सुभिधाये हैं, जैसे की उचित शिक्षा, रोज़गार, स्वास्थ्य सेवाएँ, परिवहन साधन, पूर्ण आहार इत्यादी! शायद हम इसका जवाब ईमानदारी से दे तो शायद "नहीं" होगा.

जब एक परिवार अपनी संस्कृति से दूर रहे किसी भी वजह से चाहे शिक्षा हो या रोज़गार, ऐसे हालात मैं उसके बच्चे अपनी संकृति को नहीं पहचान पायेंगे तो बचायेंगे किसे?

Tuesday, May 4, 2010

गफलत

अपना दिमाग और दुसरे का पैसा हर किसी को ज्यादा ही लगता हैं.
कई गढ़वाली भाई एक दुसरे को देख नहीं सकते और कई सिर्फ गढ़वाली होने के नाते ही उसकी हद से ज्यादा मदद करते हैं इसके पीछे क्या कारण हो सकता हैं,
क्या गढ़वाली चालक हो रहे हैं या यूँ कहे की चालाकी मैं अपना और अपने गढ़वाली भाइयों का नुकसान कर रहे हैं और अपने राज्य का नाम बदनाम कर रहे हैं.
जलन और द्वेष की भावना गढ़वालियों के अन्दर बदती जा रही हैं जिसके चलते वोह अच्छे बुरे और अपने पराये का भेद भूल कर दोनों का नुकसान कर रहे हैं.
पर्तिस्पर्धा के इस दौर मैं सफल न होने के कारन और अपने परिवार को और अपने को आगे बदने के चक्कर मैं वोह गलत कदम उठा देते हैं.
सफलता के गुरुर मैं गढ़वाली अपने से कमजोर गढ़वाली को अपना भाई मानने पर लज्जित महसूस करता हैं.

इस सब के पीछे असल क्या वजह हैं न तो मैं समझ पा रहा हूँ और ना ही जो समझ मैं आ रहा हैं उसको शब्दों मैं व्यक्त कर पा रहा हूँ....

बलि प्रथा

बलि प्रथा को मैं भी उचित नहीं समझता पर आप इस से इंकार नहीं कर सकते की इसका कोई औचित्य नहीं हैं.
गाँव में कई बार जागर मैं जाकर मैंने देवी देवताओं या भूतों को बलि की मांग करते सुना हैं, तो क्या जागर मैं नाचने वाले सब पाखंडी होते हैं जो बलि की मांग करते हैं?
बलि की मांग होने पर और न देने पर परिवार मैं होने वाली किसी भी घटना को आशंका की दृष्टि से देखा जाएगा.
बलि दिए जाने के मामले में कभी किसी भी देवी देवता ने यह नहीं कहा की मुझे बलि नहीं चाहिए थी, लेकिन यह जरूर कहा हैं की पूजा उचित तरीके न होने के कारन आपका कार्य संपन्न नहीं हुआ.