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Showing posts from May, 2010

आगे बढने का डर

हर कोई चाहता है की उसका देश, राज्य, जिल्ला, गाँव आगे बड़े और विश्व में अपना नाम करें, लेकिन शायद गढ़वाली परिपक्व लोगों की सोच इस सबसे हट कर है, वे सोचते हैं की उनका गढ़वाल आगे जाने की बजाये पीछे जाए, क्यूंकि आगे उन्हें अपने गढ़वाल का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा हैं. दिन प्रतिदिन बढती अनेको सुख के बावजूद वो खुश और संतुष्ट महसूस नहीं कर रहे हैं, आज घर घर मैं टीवी, डिश, सी डी प्लयेर सब हैं पर वो गाँव के एक घर मैं इकठा होकर किसी फिल्म या नाटक को देखने का मज़ा अलग ही था, आने वाली फिल्म और देखि गई फिल्म के बारे मैं पुरे हफ्ते चर्चा करने का अनुभव ही अलग था. हर घर मैं गाय, बैल और भैंस हुआ करती थी, सड़कों पर चलने वाली एक एक बस का नंबर याद रहता था. गाँव के पास से गुजरने वाली दुल्हन को देखने के लिए लोगों का ताँता लग जाता था और उसके रोने की आवाज़ की दुरी से उसके सुशिल होने का अंदाज़ा लगाया जाता था. गाँव मैं होने वाली शादी का खुमार एक महीने पहले से शुरू हो जाता था, विडियो और नचाड़ का इंतज़ार बेसब्री से किया जाता था. होली दीवाली जैसे त्यौहार के समीप आने की ख़ुशी को समेटने के लिए दिलों मैं जगह कम पड …

बलि प्रथा

बलि प्रथा को मैं भी उचित नहीं समझता पर आप इस से इंकार नहीं कर सकते की इसका कोई औचित्य नहीं हैं.
गाँव में कई बार जागर मैं जाकर मैंने देवी देवताओं या भूतों को बलि की मांग करते सुना हैं, तो क्या जागर मैं नाचने वाले सब पाखंडी होते हैं जो बलि की मांग करते हैं?
बलि की मांग होने पर और न देने पर परिवार मैं होने वाली किसी भी घटना को आशंका की दृष्टि से देखा जाएगा.
बलि दिए जाने के मामले में कभी किसी भी देवी देवता ने यह नहीं कहा की मुझे बलि नहीं चाहिए थी, लेकिन यह जरूर कहा हैं की पूजा उचित तरीके न होने के कारन आपका कार्य संपन्न नहीं हुआ.