Thursday, September 30, 2010

गढ़वाली भाषा

जब भी कोई Regional सांस्कृतिक कार्यक्रम होता हैं तो जितने भी उस region से related लोग आते हैं सब का आने का मकसद अलग अलग होता हैं , अधिकतर तो कार्यकर्म देखने आते हैं , बाकी मस्ती के लिए आते हैं .

आयोज़को की तरफ से तो अपनी संसकिरिति के पार्टी शर्धा नज़र आती हैं . ऐसे कार्यक्रम वही आयोजित करते हैं जिनके दिल मैं अपने उत्तराखंड की संकृति के प्रति प्यार और स्नेह होता हैं और उसे अपने लोगों में बांटने की कोशिश करते है .

यह इस बात का एक जीता जगता साबुत हैं की जो अपनी संस्कृति से प्यार करते हैं व्हो उसको बढाने की सोचते हैं किसी न किसी रूप मैं और जो लोग अपनी संस्कृति को पसंद करते हैं ऐसे कार्यकर्मों मैं बड चड़कर हिस्सा लेते हैं .

अगर हम अपनी संकृति को बड़ा नहीं सकते तो कम से कम अपने अन्दर तो जिन्दा रख सकते हैं .

हर चीज़ मैं फायदा नुक्सान और status symbol की तरह देखा जा रहा हैं , यहाँ तक की अपनी मात्र भाषा मैं भी …मुझे लगता हैं की कई लोग ऐसा सोचते हैं की गढ़वाली होने पर गढ़वाली न जानना एक Positive Sign है , या तो वह इंग्लिश बोलने की कोशिश करता हैं या फिर इंग्लिश मिश्रित हिंदी पर गढ़वाली से परहेज़ करता हैं , उसे लगता हैं की गढ़वाली मैं बात करना जैसे कोई मायने नहीं रखता और उसकी बात को परभावी नहीं बनाता, like hindi in Hindustan.

Wednesday, September 22, 2010

नजरिया

हर इंसान की एक अपनी एक सोच और नजरिया होता हैं किसी भी घटना और वस्तु को देखने का इसलिए यह जरूरी नहीं की जो एक इंसान कहे वह बात दुसरे इंसान को पसंद आये!
जो भी मैं यहाँ पर व्यक्त कर रहा हूँ वह मेरा अपना नजरिया हैं और मैं जानता हूँ की हर कोई इस बात से सहमत नहीं होगा.

जो मेरे नज़रिए को समझेगा वह शायद मेरी भावनाओं को समझ सकता हैं और जिनका नजरिया मेरे से अलग होगा वह शायद मेरी इन भावनाओं को किसी और रूप मैं ले सकते हैं.

Wednesday, September 15, 2010

गढ़वाल की विलुप्त होती रोनक

इंसान की भावनाए, चाहते अक्सर समय के अनुसार बदलती रहती हैं!
ऐसा ही हाल शहर मैं और गाँव मैं रहने वाले गढ़वालियों का भी हैं. शहर मैं रहने वाले सोच रहे हैं की रिटायर होने के बाद गाँव मैं जायेंगे और वही पर अपनी जिंदगी अपने लोगों, पहाड़ो, खेतो के बीच बिताएंगे!
वहीँ गाँव मैं रहने वाला गढ़वाली सोच रहा हैं की मैं कब इस गाँव को छोड़ कर शहर मैं जा कर बस जाऊं और इस गढ़वाल के मुश्किल और दूभर जिंदगी से छुटकारा पाके शहर की आराम दायक जिंदगी का लुत्फ़ उठाऊं.

जिस मैं जीत गाँव मैं रहने वाले गढ़वाली की होती परतीत हैं, कुछ तो सफल हो जाते हैं तो बाद मैं गाँव मैं रिटायर हो के गाँव जाने का विचार करते हैं लेकिन कुछ गढ़वाली शहर मैं आकर फंस जाते हैं पर शर्म, असफलता से दुबारा घर जाना उचित नहीं समझते!

आलम यह हो चूका हैं की अगर आप शहर मैं रहते हो और शादी या अन्य किसी समारोह के बिना गाँव जाते हो तो आप को वहां इतनी बोरियत महसूस होती है की आप दुसरे ही दिने वापस आने का प्रोग्राम बना लेते हो, इसके पीछे दिन परती दिन गाँव से होने वाला पलायन हैं, जिस से गाँव की रौनक एक तरह से समाप्त सी हो गयी हैं!