Wednesday, September 17, 2014

प्रभात की सैर और बिल्ली

आज सुबह प्रभात की सैर के दौरान ४ लोग, दो + दो जोड़ों के रूप में मेरे से आगे चल रहे थे l अचानक झाड़ियों से एक बिल्ली निकली और उनके आगे से रास्ता काट गयी l दोनों जोड़े ठिठक गए और असमंजस में फंस गए की अब क्या किया जाए, कौन आगे जाए l इस सब घटनाक्रम को पीछे से देखते हुए किसी बिल्ली के रास्ता काटने से खुद को अनभिज्ञ दर्शाते हए मैंने उनके असमंजस का हल उनसे आगे निकल कर कर दिया l लेकिन कई सवाल मेरे जेहन में उतर गए l अगर आप इन सब बातों पर इतना ही विश्वास करते हो तो इसका मतलब आप खुद को सुरक्षित रखने के लिए किसी की बलि दे रहे हो l इससे आप स्वार्थी सिद्ध होते हो, आपकी भावना भाड़ में जाए जनता अपना काम बनता वाली है l ऐसी सोच के साथ कैसे आप फिर किसी से उम्मीद कर सकते हो की आप मुश्किल में हो और दूसरा आपकी मदद करें l और भी कई अनगिनत सवाल l और सबसे बड़ी बात पूरी तरह सुरक्षित भी हूँ l :D

Thursday, August 21, 2014

मेट्रो का वृतांत

वैशाली से रामा कृष्णा आश्रम तक के लिए मेट्रो ली लक्ष्मी नगर से एक युवक ने दो युवतियों के साथ प्रवेश किया और मेरे समीप आके खड़े हो गए l लड़का ठीक ठाक घर से मालूम पड़ता था और उसके साथ की युवतियों में से एक उसी के समकक्ष परिवेश से मिलती थी लेकिन दूसरी युवती थोडा आर्थिक रूप से कम संपन्न घर से महसूस हुयी l शायद तीनो महाविध्यालय के मित्र थे l युवक ने अपने समकक्ष वाली युवती से पूछा खाने में क्या लायी है और उसने पुलाव कहाँ और युवक ने उसके थेले से उसका खाने का डब्बा निकाल कर खाना चालू कर दिया l वातानुकूलित मेट्रो में खाने की गंध व्याप्त हो गयी और उद्घोषणा होती रही की “कृपया मेट्रो में खाना पीना वर्जित है“ l मन में तो आया की कुछ कहूं लेकिन शायद कीचड़ में पत्थर फेंकने पर खुद पर छीटे आने का आभास हुआ तो मन को समझा कर शांति से खड़ा रहा l इस दौरान उनका वार्तालाप भी जारी था और समकक्ष वाली युवती से युवक अधिक घनिष्टता और प्यार से बात कर रहा था लेकिन जब भी आर्थिक रूप से कम संपन्न घर वाली युवती उस युवक से कोई भी बात पूछती या कहती तो उसका जवाब युवक बहुत ही अपमान जनक स्वर और शब्दों में देता l जैसे की युवती ने पूछा की “तुम्हारा असली नाम क्या है” जवाब आया “तुझे क्या”, युवती ने पूछा “...... ये क्या तुम्हारा असली नाम है” जवाब आया की “होगा भी तो तुझे क्या”, “तू अपना दिमाग अपने पास रखा कर”, “तू बोला ही मत कर” l और युवती उस युवक के स्वर और शब्दों को हर बार एक नकली मुस्कराहट के साथ छिपा जाती l ऐसे ही जितनी भी बार वह युवती उस युवक से कुछ भी पूछती वह युवक बहुत ही अप्रिय स्वर और शब्दों में जवाब देता l लेकिन उसके साथ वाली लड़की ने एक बार भी ये जतलाने की कोशिश नहीं करी की उस युवक को ऐसा जवाब नहीं देना चाहिए था l जो मुझे एहसास हुआ की शायद तीनों एक ही कक्षा के विध्यार्थी होंगे और युवक और समकक्ष वाली युवती की अच्छी निभती हो लेकिन दूसरी युवती समकक्ष वाली युवती की सहपाठी होने के नाते एक अच्छा दोस्ताना सम्बन्ध स्थापित करने की कोशिश कर रही थी जिसके लिए युवक बिलकुल भी सहमत प्रतीत होता हुआ नहीं लगा और अपनी सभ्यता को बिना किसी लाग लपेट के प्रस्तुत करता रहा l कई बार दिल में आया की उस युवती से कह दूं की आत्म सम्मान ज्यादा महत्वपूर्ण है ऐसे किसी जबरदस्ती के सम्बन्ध स्थापित करने से लेकिन फिर दिमाग ने कहाँ की दुसरे के फटे में टांग अड़ाने से अपनी ही टांग को नुकसान होगा l मंडी हाउस तक युवक ने पूरा खाना ख़त्म किया और तीनो मेट्रो से प्रस्थान कर गए और पीछे छोड़ गए खाने की महक l

Monday, May 26, 2014

गढ़वाल की एक शादी

पिछले महीने गढ़वाल की एक शादी में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, उसी का विर्तान्त लिख रहा हूँ l अपने स्कूली दिनों मे जब गाँव में था तो बारात में जाने का एक अलग ही खुमार होता था l बड़ी ही बेसब्री से गाँव में होने वाली शादियों का इंतज़ार हुआ करता था l बस की छतो पर बेठ कर चिल्लाते हुए जाना, नाचना, शिष्टाचार स्वरुप मिलने वाले तिलक के पैसो का इंतज़ार और रसना जैसे किसी कोल्ड ड्रिंक का स्वाद गजब होता था l सालियों के साथ मस्ती और उनको लूभाने और पटाने के लिए किये जाने वाले कारनामे l कुल मिलाकर एक अदभुत अनुभव हो जाता था जिंदगी का जो बहुत लम्बे समय तक दोस्तों के बीच में बताने और सुनाने के लिए याद रहता था l ऐसी ही कुछ यादों को संजोये में गाँव के ही एक लड़के की बारात में गया जहाँ लगभग मेरे समय के दोस्तों से मुलाक़ात हुयी काफी अरसे के बाद जो की सब अलग अलग शहरों और नौकरियों में व्यस्त है l न्युतेर के दिन ही एहसास हो गया जब मेरे सारे दोस्त दारु की खोज में इधर उधर निकल गए और में अकेला रह गया और उसके बाद नशे में सब DJ में लहराते हुए नज़र आये l एक दो छिटपुट लड़ाई की घटनायें भी हुयी जो की एक सामान्य सी बात होती है l अगले दिन फिर काफी खुशनुमा मिजाज़ में बारात में गए l बारात अपने नियत स्थल पर पहुंची और सब के सब बाराती अपने अपने दारु के जुगाड़ के लिए भटकने लग गए l दूल्हा खुद अकेला रह गया तो उसके साथ बेठ कर मैंने कुछ समय व्यतीत किया और दुल्हे के रश्मों और रिवाजों के दौरान मैंने खुद को बच्चों के बीच में बेठा हुआ पाया क्यूंकि साथ के लड़के सब इधर उधर गुम हो चुके थे l गाँव के नजारों को देख कर ही मैंने अपना समय व्यतीत किया l कुल मिला कर ये एहसास हुआ की पहाड़ की शादी में दारु पीने के बाद जो आनंद लिया जा सकता है उससे शायद मेरे जैसे न पीने वाले वंचित रह जाते है l