Monday, August 31, 2015

नियम कानून

दफ्तर से घर वापसी के मध्य ATM से राशि निकालने हेतु बाइक को एक ATM के समीप पार्क किया और ATM के दरवाज़े पर आकर रुक गया l क्यूंकि कोई व्यकित पहले से ही अन्दर मौजूद था l इस इंतज़ार के दौरान ATM में प्रवेश हेतु नियम मानस पटल पर कोंधे और हेलमेट सर से उतर कर हाथों पर लटक गया ! इसी बीच एक महिला का आगमन हुआ और मेरे पीछे लाइन में लगने की बजाय वह मेरे से पहले प्रवेश करने की मंशा के साथ मेरे बगल में खडी हो गयी और जैसे ही एटीएम इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति ATM से हटा वह महिला दरवाज़ा खोल कर अन्दर जाने लगी तो मुझे टोकना पड़ा की “आप से पहले मेरा नंबर है” इस पर अन्दर घुसते हुए वह बोली की उसे जरा जल्दी है ! बिना किसी विनय भाव के कहे गए उसके ये शब्द मुझे अच्छे नहीं लगे और मुझे फिर से उसे टोकना पड़ा की “अगर किसी को जल्दी है तो इसका मतलब ये नहीं की नियमों को तोड़ दिया जाए”, इस पर वही बोली की मेरा चश्मा घर पर ही छूट गया है और जो ब्यक्ति अन्दर है उसी से कह के वह अपने पैसे निकलवा लेगी और अगर आप चाहो तो आप ही निकाल कर दे दो! मैंने कहा “पहले मेरा नंबर है इसलिए पहले मुझे पैसे निकालने दो” क्यूंकि अभी तक उसके शब्दों में मुझे विनय वाला भाव कम और जबरदस्ती वाला भाव ज्यादा नज़र आ रहा था l इस पर वह बोली की वह २-३ ATM से घूम कर आ चुकी है और कहीं राशि नहीं निकाल पायी और अचानक से इस बहस के बीच ATM में पहले से मौजूब व्यकित पर उसकी नज़र पड़ते ही वह बोली की अरे ये व्यक्ति भी पिछले एटीएम में था और उसको अपना ATM कार्ड देते हुए बोली की उसके पैसे निकाल दे l बिना विनय की जबरदस्ती होते देख मुझे फिर कहना पड़ा की “आप जिस से मर्ज़ी पैसे निकलवाओ लेकिन पहले में आया हूँ तो पहले में ही पैसे निकालूँगा” और अपना ATM निकालकर आगे की प्रक्रिया जारी कर दी l मेरी इस बात पर वह महिला बिफर पड़ी और फिर अपना आपा खोते हुए कहने लगी “बड़ा आया नियम कानून वाला, ऐसा खडूस आदमी मैने जिंदगी में पहली बार देखा है l नियम क़ानून तो तुझे में बताउंगी जब रास्ते पर चलते हुए नज़र ज़रा सा भी इधर उधर हुयी उसी समय सारे नियम कानून याद दिला दूंगी l एक लेडीज रिक्वेस्ट कर रही है और फिर भी इसे कोई फर्क नहीं पड़ रहा” उसकी इन बातों को धेर्यपूर्वक सुन कर अनसुना करते हुए में पैसे निकालने की प्रक्रिया में जुटा रहा l इसी बीच उसका फ़ोन आया जिसको उठाते समय उसने कहा “हेल्लो, हाँ इंस्पेक्टर ***** शर्मा बोल रही हूँ” उसके इन शब्दों को सुन कर मुझे ATM में लगे CCTV कैमरा का ध्यान आया जो की इस बात का गवाह बनता की मेरी कोई गलती नहीं थी और ना ही मैंने कोई अपशब्द या अशिष्ट आचरण किया था l बहरहाल जब तक मैंने ATM से पैसे निकाले उस महिला इंस्पेक्टर के शब्द बाण मुझ पर बरसते रहे और में शालीनता के साथ अपना कार्य संपन्न करके निकाल गया l

Saturday, July 4, 2015

उधेड़बुन

Synus के लिए होम्योपथिक का इलाज चल रहा है तो इसी कारणवश कल शाम होम्योपथिक डॉक्टर के पास पहुंचे और अधिकांश भारतवर्ष की तरह ऐसी जगह पर पहुचते ही आपका नंबर लग जाता है बिना किसी पर्ची या कूपन के, बस ये नोटिस करना पड़ता है की कौन आपसे पहले आ रखा है और कौन आपके बाद आया है l अपने से पहले आये लोगों पर एक नज़र दौड़ा कर अपने फ़ोन पर मशगुल हो गए Zombie VS Plants गेम खेलने में l इसी बीच एक बुजुर्ग दम्पति आये जिनका नंबर मेरे बाद बनता है क्यूंकि में उनसे पहले आ रखा हूँ l बुजुर्ग दम्पति के आते ही मेरे से आगे की सीटें खाली हुयी और वो उस पर बैठ गए l अब मेरे अन्दर एक उधेड़बुन शुरू हो गयी की ये आये तो मेरे से बाद में है लेकिन मेरे से आगे बेठ गए है तो क्या मुझे इन्हें ये बताना चाहिए की आपका नंबर मेरे बाद में है या इनको इल्म होगा की हमसे पहले किसी और का नंबर है l इसी उधेड़बुन में कुछ और लोग डॉक्टर से परामर्श और दवाई लेके चले गए और बुजुर्ग लोग आगे आगे खिसकते चले गए l फिर वो समय भी आ ही गया जब मेरे से पहले आये आदमी का नंबर आ चूका था और उसके बाद मेरा नंबर आना था लेकिन मेरे से पहले बुजुर्ग दम्पति अन्दर जाने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे और में असमंजस में बेठा था की इनको बोलू की नहीं की मेरा नंबर आपसे पहले है l मेरे दिमाग ने मुझे चेताया की अगर ये मुकर गए की “नहीं जी हमारा नंबर पहले है” तो मुझे फिर बोलना पड़ेगा की आप झूठ बोल रहे है और इस बात पर विवाद बढ़ सकता है और फिर दुसरे लोग भी ये ही सोचेंगे की एक जवान लड़का बुजुर्गों से पहले जाने के लिए झगड़ रहा है l क्या हो जाएगा अगर इनके बाद चला जाएगा l मेरे दिल ने कहा तो क्या में तो अपनी जगह सही हूँ l दिमाग बोला लेकिन तेरा समर्थन करने वाला तो कोई नहीं होगा और ऐसे में सच्चा होते हुए भी तू झूठा साबित हो जाएगा l और इसी बीच डॉक्टर की आवाज़ आई “next” और मेरी सारी उधेडबुने उस आवाज़ में दब कर रह गयी क्यूंकि वो दम्पति अन्दर जा चुके थे l

Saturday, May 9, 2015

रविवासरीय

रविवासरीय
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सुबह पाँच बजे उठ कर प्रभात सैर को निकलेंगे और शनिवार को नींद के आगोश के कारण जो सुबह की सैर छूट गयी थी उस कसर की पूर्ति को ध्यान में रखते हुए कुछ ज्यादा भागदौड़ की जायेगी।

साढ़े छे बजे तक वापस आकर नित्यक्रम से निवृत होकर चाय की प्याली के साथ समाचार पत्र पर खर्च होने वाले महीने की रकम को निचोड़ने को कोशिश की जायेगी। इस दौरान हर खबर पर दिमाग में कई बातें दौड़ेगी और उन सब बातों को किनारे रख कर पेट में दौड़ने वाले चूहों की संतुष्टि के लिए श्रीमती जी से नाश्ते का मीनू पूछेंगे और संतुष्टि के लिए कुछ विकल्प भी सुझायेंगे।

ततपशचात केशों पर मेहँदी लगाने का आयोजन है और मेहँदी लगने के बाद एक आधी देखी हुयी फ़िल्म LUCY देखने का विचार है ताकि ये निष्कर्ष निकाला जा सके की फ़िल्म को 5 में से कितने सितारे दिए जा सकते है। इस बीच दोपहर के खाने का मीनू भी निर्धारित कर लिया जाएगा।

खाने के बाद एक झपकी लेने का विचार है और फिर संध्या को अपने प्रम मित्र कुलदीप के साथ एक रेलवे स्टेशन की तरफ सैर पर जाते हुए अपने वर्तमान जीवन में घटित घटनाओं का आदान प्रदान करने का भी विचार है।

संध्या सैर से वापस आकर रात्रि भोजन का प्रोग्राम होगा और फिर अगले दिन के कार्यों को ध्यान में रख कर निंद्रा देवी की तरफ अग्रसर हो जायेंगे।

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बोलो तथास्तु।

Wednesday, April 22, 2015

बदमाश

जो आसानी से हासिल न हो पाए उसे पाने के लिए किये गए गलत शारीरिक या यांत्रिक तरीके को अख्तियार करने वाले को बदमाश कहते है l (बदमाश की ये मेरी अपनी परिभाषा है जो मैंने महसूस करी है) अब तक के जीवन के सफ़र में मेरा भी कुछ ऐसे लोगों से वास्ता, जान पहचान या सम्बन्ध कुछ भी कह सकते है पड़ा है जिन्हें लोग “बदमाश” कह के पुकारते है या समझते हैl बदमाशी के लक्षण अक्सर स्कूल समय से ही दिखने लग जाते है l अब ये कुदरती है या उचित मार्गदर्शन की कमी, में इस बारे मे असमंजस मे हूँ l हर किसी को सब कुछ तो हासिल नहीं हो सकता जैसा की धनी परिवार, अच्छी शक्ल सूरत, अच्छा दिमाग इत्यादि लेकिन बाल मन कहाँ समझता है ये सब और स्कूल के समय में यही अधिकतर की जरूरत होती है l बची खुची कसर सिनेमा पूरा कर देता है l कुछ बच्चे इस को समझ जाते है या इस लाइन में जाने का साहस नहीं उठा पाते है तो कुछ बस किसी भी कीमत पर हासिल करने की ठान लेते है और अपना प्रभुत्व ज़माने की खातिर अपनी शारीरिक और यांत्रिक क्षमता का दुरूपयोग करके कमज़ोर को अपना शिकार बना कर अपना मतलब सिद्ध करते है और एक दो बार इस तरह की मनवांछित वास्तु पाकर इनके होंसले इतने बुलंद हो जाते है की फिर ये पीछे मुड़ कर कम ही देखते है l बेहरहाल, अब तक के जीवन में जितने भी बदमाश कहे जाने वाले शख्स मेरी जानकारी में आये उनमे से केवल एक ही जीवित है और वो भी विकलांगता के अभिशाप के साथ बाकी अन्य चार किसी न किसी बदमाशी वाले घटनाक्रम में अपना जीवन गवा चुके है l फिर भी बदमाशी का नशा दिलो दिमाग पर ऐसा हावी होता है की एक बार अगर चढ़ जाए तो फिर उतरना नामुमकिन सा लगता है l