Thursday, November 3, 2016

दिवाली प्रतियोगिता

दिवाली के उपलक्ष्य में कंपनी में एक प्रतियोगिता रखी गयी। अपनी डिवीज़न के नेतृत्व की बागडोर मेरे हाथों में सौंपी गयी।

हमारी डिवीज़न से 19 लोग प्रतियोगिता के लिए इच्छुक थे, मेरे दिमाग के घोड़ो ने दौड़ कर एक कॉन्सेप्ट तैयार किया।

भारत के नक़्शे के बीच में रंगोली बनायीं जायेगी और थोड़ा बहुत सजावट की जायेगी। किसी भी त्यौहार का मकसद होता है ख़ुशी व्यक्त करना और ख़ुशी तभी महसूस की जा सकती है जब हम अपने आपको चारो और से सुरक्षित महसूस करे। बारह व्यक्तियों को चार चार के रूप में दीवार का रूप देकर तीन दीवार बना दी गयी।
पहली दीवार को नाम दिया गया ARMY जो ये दर्शाती है कि हमें एक तरफ से आर्मी द्वारा सुरक्षा प्रदान की जा रही है और हमें बाहरी देशों से असुरक्षित महसूस करने की जरुरत नहीं।
दूसरी दीवार को GOVT का रूप दिया गया जो हमारे लिए विभिन्न तरह की नीतियां बना कर सुरक्षा प्रदान करती है जैसे की कानून, न्यायलय, हॉस्पिटल, रोजगार, यातायात के साधन, सड़क, पुल, एयरपोर्ट इत्यादि।
तीसरी दीवार को HMSC (Hindu, Muslim, Sikh, Christian) का रूप दिया गया जिन्होंने हमें अपने धर्मों के माध्यम से त्योहारों के रूप में आपस में मिल बाँट कर खुशियां मनाने व लोगों की एकता को मजबूत करने की प्रेरणा देकर देश को सुरक्षा का माहौल दिया।

चौथी दीवार अदृश्य दीवार थी जिसे हमारे दिल और दिमाग ने रचित किया है और हमारे विवेक के हिसाब से तय होता है कि क्या हमारे लिए क्या सही है और क्या नहीं। हमारे द्वारा उठाये गए सही कदम या कार्य हमारी सुरक्षा को मजबूती देंगे।

अगर इस तरह की चौतरफा सीमा किसी देश की हो तो वहां के त्योहारों से प्राप्त होने वाले खुशियों की कोई सीमा नहीं होगी।

जयहिंद!

Fever of M S Dhoni

Never thought of watching M S DHONI, as i assumed what can be especial in the movie made on a cricketer's life so skipped since it was released.

In the evening when sun left for the day and darkness arrived for changing calander date there was nothing to do except exploring phone to delete unnecessary files to get some more space for new contents, a gigabit of MS Dhoni was consuming good amount of space and before deleting i thought lets give it a try before saying goodbye for forever.

The moment I started watching movie it grabbed me so warmly and i lost in it as the time frame of my teenage was flashing on the screen and i found myself deeply connected to the characters and their feelings moving in the movie.

I admire the storyline of the movie as there was no cricket which i assumed from the movie made on a cricket's life but there was process, struggles, relations, feelings and many more except cricket.

Now I am deeply in love with music and songs of the movie as i feel songs are containing feeling of love which was in environment at that time. Specially "Jab Tak" & "Kaun Tujhe".

Thursday, August 25, 2016

एक सार्थक सफर (Suffer)

रात्रि 11:30 पर जैसे ही देहरादून के लिए एक और बस मोहन नगर पर पहुंची कुछ लोग इस उम्मीद में उसकी तरफ लपके की शायद इस बस में कोई सीट खाली हो। लेकिन कंडक्टर बाबू ने स्पष्ट कर दिया की बस में सीट नहीं है खड़े खड़े जाना पड़ेगा, बिना कोई पल गवाये में बस में सबसे पीछे खड़ा था जिसमे पहले से ही चार व्यक्ति मेरी तरह खड़े होके सफर करने की ठान चुके थे । पहले की तीन बसों का भी यही हाल था। लेकिन मेरे मन में ये उम्मीद थी की शायद मेरठ या रुड़की के पास की कोई सवारी तो होगी ही जो उठेगी और तब में उसपे बैठ जाऊंगा और लगे हाथों अपनी शारीरिक क्षमता का पता भी चल जाएगा।

शायद मेरी तरह असंख्य लोग बिना किसी प्रायोजित कार्यक्रम के राखी के उपलक्ष्य में देहरादून जाने की ठान बैठे थे।

आईपॉड की धुनों पर मेरठ करीब आता चला गया और बस में बैठे यात्रियों में कोई हलचल न देख कर में पैरों में हलचल उत्पन्न हो गयी। किसी तरह दिलासा देकर की मेरठ की न सही शायद खतौली या उसके आस पास कोई उतरे लेकिन आशा की किरण सूरज न बन सकी।

भोजन अवकाश के लिए बस जब एक निर्धारित ढाबे पर पहुंची तो कंडक्टर से संपर्क करने पर सुचना मिली की केवल एक ही व्यक्ति है जो रुड़की उतरेगा और उसके लिए पहले ही एक व्यक्ति उस से संपर्क कर चूका है।

अब कोई चारा नहीं बचा था, सारी उम्मीदों को कंडक्टर की एक लाइन ने पेंसिल से हुयी गलती की तरह रबड़ से मिटा डाला। संगीत और  बस के डंडे के सहारे ऊंघते हुए असंख्य मुद्रायें बनाते हुए पैरों को होने वाले कष्ट को जैसे तैसे भ्रमित करने की कोशिश में रुड़की तक पहुँच गये।

रुड़की में बस निर्धारित समय से अधिक रुकने पर पता चला की ढाबे पर दो व्यक्ति छूट गए है जो किसी दूसरी बस में बैठ कर आ रहे है और अब उनका इंतज़ार किया जा रहा है। इस इंतज़ार के समय को मेरे पैरों ने रुड़की बस अड्डे पर रखे एक तख्ते पर बैठ कर आराम करते हुए बेहतरीन ढंग से भुनाया। तक़रीबन 45 मिनट पश्चात् वो दोनों व्यक्ति आये और बस देहरादून के लिए अग्रसर हुयी। आगे की यात्रा बिना किसी खास दिक्कत के संपन्न हुई।

एक सार्थक सफर जो suffer करते हुए संजोय लिया गया है।

Tuesday, May 10, 2016

लाइन

पिछले हफ्ते की घटना जो की आज की घटना का पहला चरण कहा जा सकता है।

चलते हुए जैसे ही बाइक की पेट्रोल मापक सुई ने निम्नतम स्तर को छुआ ऑफिस के रास्ते में आने वाले एक पेट्रोल पंप को ध्यान में रख कर पेट्रोल भरवाने का सुनिश्चित किया।

पेट्रोल पंप पर पहुँच कर दो बाइक के पीछे अपनी बाइक लगा के बटुए से पैसे निकाल कर अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा। इतने में दो और बाईक आई और सबसे आगे खड़े व्यक्ति के बगल में खड़ी हो गयी। जैसे ही मेरे से आगे वाले का पेट्रॉल भरा उसके बाद बगल वाले के पैसे लेकर पंप कर्मचारी उसकी बाइक में पेट्रोल डालने के लिए तत्पर हुआ मैंने टोकते हुए कहा की "पहले मेरा नंबर है, पहले मुझे पेट्रॉल मिलना चाहिए" लेकिन पंप कर्मचारी ये कहते हुए उसकी गाडी में पेट्रोल डालने लगा की अब वो आगे आ गया है तो क्या करूँ।

उसके बाद काफी उपदेश सुनाया की अगर पीछे आने वाले को पेट्रोल पहले दे दोगे तो फिर दुबारा वो आगे आएगा, लाइन में क्यूँ लगेगा। लेकिन शायद ये उनके लिए एक दिनचर्या है की लोग आते है और चिल्ला कर निकल जाते है। खैर मैंने भी पेट्रोल भरा कर अपने पथ पर बड़ गया।

आज की घटना या दूसरा चरण।

आज भी जैसे ही पेट्रोल मापक सुई अपने निम्नतम स्तर पर पहुंची तो फिर दूबारा उसी पेट्रोल पंप की तरफ अग्रसर हुए और दुर्भाग्यवश पिछले हफ्ते वाली परिस्तिथियाँ रही की दो बाइक के बाद मैंने अपना नंबर लगाया और एक बाइक फिर आगे वाले के बगल में आके खड़ी हो गयी। फिर पेट्रोल पंप कर्मचारी द्वारा पहले वाले को पेट्रोल देना और मेरा टोकना और उसका वही रटा रटाया जवाब की वो पहले आ गया तो क्या करूँ।

उसको आगे कुछ न कह के पेट्रोल भरवा कर पेट्रोल पंप के प्रबंधक से मिला और अपनी समस्या से अवगत कराया। उस कर्मचारी को बुला कर पिछली बारी और अबकी बारी का किस्सा सुनाया लेकिन उसका वही जवाब की अगर कोई आगे आ जाये तो क्या करे। फिर प्रबंधक द्वारा वही उपदेश की जो पहले आता है उसको पहले पेट्रोल दो।

तो क्या लगता है। कमी कहाँ है?

1. उस पेट्रोल पंप कर्मचारी की जो की आगे आने वाले को पेट्रॉल दे देता है। वो भी तब जब आधी से ज्यादा जनता पेट्रोल ऐसे ही भराती है।

2. उन लोगों की जो लाइन में न लग कर आगे आ कर खड़े हो जाते है।

3. मेरी जो की भारत की जनता को जानते हुए भी एक कर्मचारी की शिकायत उसके प्रबंधक से कर बेठा और उसको डाँट पिलवा दी।

Friday, April 22, 2016

गुरु या भगवान

पुस्तकों को हमेशा गुरु का दर्ज़ा दिया गया है। पाठ्यक्रम और उसके बाहर जितनी भी पुस्तकें पड़ी है सब ने एक ही सन्देश दिया है की...
- ईमानदारी से जीवन व्यतीत करो।
- सदैव सच्चाई का साथ दो।
- अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाओ।
इत्यादि।

और माता पिता को भगवान का दर्जा दिया गया है। लेकिन आज के माता पिता समाज से इतना भयभीत है की  वह अपने बच्चों और शुभचिंतको को हमेशा यही सलाह देते नज़र आते है की जमाना ख़राब है और...
- अगर गलती आप की नहीं भी हो तो बहस करने की जरूरत नहीं माफ़ी मांग कर मामला ख़त्म कर दो।
- ईमानदारी घर के अंदर तक ही सिमित रखो, बाहर मौके के हिसाब से चतुराई से काम लो।
- कभी किसी को अपनी सच्चाईयों से अवगत मत कराओ।
इत्यादि।

अब फैसला आपके विवेक पर है की गुरु की बात माने की भगवान की।

Monday, April 11, 2016

iphone

जैसी ही रेलगाड़ी अपने आखिरी स्टेशन के प्लेटफार्म पर पहुंची, लोगों में पहले उतरने की हड़बड़ाहट और जद्दोजहद शुरू हो गई। परिवार सहित होने के नाते मैंने आखिरी में ही उतरना मुनासिब समझा और जब लगभग सब लोग उत्तर चुके थे में भी उतरने के लिए आगे चलने लगा तभी अकस्मात् एक सीट पर गिरे हुए फ़ोन पर नज़रे पड़ी। पहली नज़र में भांप गया की उस सीट पर बेठे हुए शख्स की पेंट से फिसल कर फ़ोन सीट पर ही गिर गया और वो जल्दबाज़ी में उत्तर चूका है। उठाने पर माइक्रोमैक्स मॉडल का कीपैड फ़ोन जो की हाल ही में लिया हुआ प्रतीत हुआ जिसकी कीमत लगभग 2-3 हज़ार होगी, उसको अपनी जेब के हवाले किया और बस स्टेशन की तरफ अग्रसर हो गया इस उम्मीद में की उसका मालिक भी उधर ही होगा और फ़ोन खोने की चेतना पर आसपास से ही फ़ोन करेगा। लगभग 10 मिनट के अंतराल के बाद ही उस फ़ोन पर "प्रमोद" नाम से फ़ोन आया और फ़ोन खोने की बात कही। नज़दीक ही एक पेट्रोल पंप था जहाँ पर उनसे मुलाक़ात तय हुयी और 5 मिनट में ही एक बुजुर्ग एक नवयुवक के साथ मिले। फ़ोन मिलने पर उनकी ख़ुशी को मैंने अच्छे से महसूस किया शायद ये फ़ोन उनके लिए किसी iphone से कम नहीं था। धन्यबाद के साथ बुजुर्ग बोले अमूनन ऐसी चीज़े खोने के बाद अक्सर मिलने की अपेक्षा न के बराबर होती है। मैंने कहा चिंता न करे दुनिया में अच्छाई अभी बची हुयी है और फिर अपने परिवार के साथ आगे बढ़ गया। (रही बात फ़ोन को अपने पास रखने के विचार का आना, सो आया लेकिन मुझे पता था की जो ख़ुशी मुझे इस मुफ़्त के फ़ोन को प्राप्त कर होगी वो ख़ुशी उसके सामने बहुत कम होगी जो मुझे इस फ़ोन को लौटा कर मिलेगी और ऐसा में महसूस भी कर रहा हूँ)