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बसंत पंचमी

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आज शहर की इस धुंधली बालकनी में बैठकर मेरी नजर सिर्फ कैलेंडर तक ही पहुंच पा रही थी जिसे देखकर पता चला कि कल बसंत पंचमी है और मन में संजोए बचपन के वृत्तचित्र 4K में चलने लगे। यहाँ तो बस तारीखें बदलती हैं, लेकिन मेरे गाँव में तो कल पूरी फिजा बदल जाएगी। मुझे याद है, जब मैं छोटा था, माघ की कड़ाके की ठंड से हमारी उंगलियां सुन्न रहती थीं। लेकिन बसंत पंचमी के दिन जैसे सूरज भी जल्दी जाग जाता था। रसोई से आती माँ द्वारा पकाए जा रहे पकवानों की सुगंध से रजाई के अंदर ही भूख जाग जाती थी। गाय के गोबर के बीच में फंसे ज्यों की कोंपलों से घर के दरवाजों को सजा कर बसंत का स्वागत किया जाता था, कुछ ज्यों की कोंपले मेरे भी कानों के बीच में फंसी हुई महसूस हुई जो कि एक विशिष्टता का अनुभव कराती थी। वो ज्यों की कोंपले हमारे लिए किसी महंगे तोहफे से कम नहीं होते थे।सरसों के खेतों ने ओढ़ी पीली चादर देखकर मन हर्षित हो जाता था। आस पास के बड़े मंदिरों में इष्ट देव के पूजन के साथ घूमने का एक अवसर मिलता था, बसों और टैक्सियों में जगह मिलना जटिल हो जाता था तो छतों का इस्तेमाल कर गंतव्य तक पहुंचा जाता था। नवयुवक...

सकारात्मक मांसाहार

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ऑफिस में जैसी ही फोन छटपटाया, व्हाट्सएप पटल पर घर से आई सूचना ने बतलाया कि आज शरीर के परजीवियों को मांसाहार की तलब लग रही है। तारिक भाई की दुकान पर पहुंच कर चिकन का ऑर्डर दे दिया। चिकन वाला अंदर गया और एक मुर्गे को पकड़ने के लिए जैसे ही पिंजरे में हाथ डाला, सब मुर्गे कहने लगे "मुझे उठाओ, मुझे उठाओ" उनकी गुजारिशों को दरकिनार करते हुए चिकन वाले ने एक तंदुरुस्त सा मुर्गा पकड़ा, उसकी पकड़ मुर्गे को जैसे ही अपने तन पर महसूस हुई तो उसका दिल चहक उठा और वो बोला "आज तो मेरी लॉटरी लग गई, अलविदा दोस्तों" लॉटरी लगने की सूचना से बाकी मुर्गे निराशा में जैसे गूंगे हो गए। जैसी ही मुर्गे की गर्दन पर छुरी चली और ड्रम में पटका गया, उत्साह में निरवाना को प्राप्त करते हुए मुर्गा बोलने लगा "बहुत टेस्टी बनूंगा" बहुत टेस्टी बनूंगा"।