बसंत पंचमी
आज शहर की इस धुंधली बालकनी में बैठकर मेरी नजर सिर्फ कैलेंडर तक ही पहुंच पा रही थी जिसे देखकर पता चला कि कल बसंत पंचमी है और मन में संजोए बचपन के वृत्तचित्र 4K में चलने लगे। यहाँ तो बस तारीखें बदलती हैं, लेकिन मेरे गाँव में तो कल पूरी फिजा बदल जाएगी।
मुझे याद है, जब मैं छोटा था, माघ की कड़ाके की ठंड से हमारी उंगलियां सुन्न रहती थीं। लेकिन बसंत पंचमी के दिन जैसे सूरज भी जल्दी जाग जाता था। रसोई से आती माँ द्वारा पकाए जा रहे पकवानों की सुगंध से रजाई के अंदर ही भूख जाग जाती थी।
गाय के गोबर के बीच में फंसे ज्यों की कोंपलों से घर के दरवाजों को सजा कर बसंत का स्वागत किया जाता था, कुछ ज्यों की कोंपले मेरे भी कानों के बीच में फंसी हुई महसूस हुई जो कि एक विशिष्टता का अनुभव कराती थी।
वो ज्यों की कोंपले हमारे लिए किसी महंगे तोहफे से कम नहीं होते थे।सरसों के खेतों ने ओढ़ी पीली चादर देखकर मन हर्षित हो जाता था।
आस पास के बड़े मंदिरों में इष्ट देव के पूजन के साथ घूमने का एक अवसर मिलता था, बसों और टैक्सियों में जगह मिलना जटिल हो जाता था तो छतों का इस्तेमाल कर गंतव्य तक पहुंचा जाता था।
नवयुवक और युवतियों के मन में कुछ अलग ही उमंगे और आशाएं होती थी। समझ रहे हो न...?
मेरा मन आज उसी पहाड़ी पगडंडी पर खड़ा है, जहाँ कल सुबह कोई बच्चा अपने कानों पर ज्यों लगाकर मुस्कुरा रहा होगा।
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