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नेगी जी और नए गायक

नेगी जी ने गढ़वाल की परिस्थितियों, वहां के लोगों की भावनाओं (ख़ुशी, गम, मिलना, बिछड़ना, याद, बचपन, जवानी, बुडापा इत्यादी) को जिस तरह शब्द देकर गीतों मैं पिरोया हैं वह अतुलनीय हैं, उनके जैसे इन्सान को पाकर गढ़वाल धन्य हैं. लेकिन जिस तरह से परिस्थितियां और भावनाए बदल रही हैं उसी तरह लोग भी बदल रहे हैं, लोगो की पसंद भी बदल रही हैं. जो लोग अन्य गायकों के गानों को पसंद कर रहे हैं उनके लीये तो नेगी जी और अन्य गायक बराबर हैं और भविष्य में नेगी जे के आभाव में तो यह नए गायक ही उनके लीये गढ़वाल के उच्चतम गायक बन जायेंगे. भविष्य में जब कल वाली परिस्थितियां और गायक नहीं रहेंगे तो जो भी नया गायक वर्तमान परिश्थितियों और भावनाओं को थोडा बहुत भी अपने गीतों में ढाल पायेगा वही भविष्य का गायक बन जाएगा. भले हम लता, किशोर, रफ़ी जैसे गायांकों को नहीं भुला सकते पर सोनू निगम, उदित नारायण, के. के., सुनिधि जैसे गायकों को भी नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते.

आग और धुआं

बिना आग के तो धुआं नहीं उठता अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे की जितने भी परिवार गाँव मैं विषम परिस्तिथियों में जी रहे हैं उसमें कहीं न कहीं दारु का एक महतवपूर्ण योगदान हैं. गाँव मैं ज्यादातर फौजी रहते हैं और पेंसन आने के बाद अगर उन्होंने कोई काम धंधा कर लिया तो ठीक नहीं तो सिर्फ दारु पिने के लिए जीवित हैं, जिसकी वजह से उनके परिवार वालों को न जाने क्या क्या सेहन करना पड़ता हैं! रोज़गार गाँव मैं कम ही हैं और जो भी हैं वो मेहनत वाला होता हैं ऐसे मैं जब आदमी सारा दिन काम करता हैं और शाम को दारू पर पैसे बर्बाद कर देता हैं तो उसके असर को आप एक परिवार का सदस्य न होने पर भी महसूस कर सकते हैं, ऐसे अनेको उदाहरण आपको हर गाँव में मिल जायेंगे. दारु वैसे तो सभी की एक बहुत बड़ी कमजोरी हैं लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर गढ़वाल में इसके काफी भयंकर परिणाम देखने को मिलते हैं जिसके चलते परिवार का कोई सदस्य प्रगति नहीं कर पाता! अब तो आलम यह हो चूका हैं हे की १० साल का बच्चा भी दारू की गिरफ्त में आ चूका हे और व्यस्क होने पर और अपूर्ण शिक्षा और परिवार के भरण पोसन की जिमेदारी लेकर शहर मैं पहुँचता हैं तो दारु को ...

वास्तविकता का भविष्य

हम नेगी जी के गानों को पसंद करते हैं क्यूंकि उन्होनो गढ़वाल की उन परिस्थितयों, भावनाओं पर गाने लिखे हैं जिनको हम सब ने देखा और महसूस किया हैं इसलिएवो हम सब के चहेते हैं. गढ़वाल और गढ़वाल के लोग धीरे धीरे बदलते जा रहे हैं साथ मैं परिस्तिथियाँ और भावनायें भी बदल रही हैं, भविष्य मैं जब ऐसी कोई परिस्तिथि और भावनाए नहीं रहेगी जो नेगी जी ने अपने गानों में पिरो रखे हैं तो क्या नयी पीडी को लगेगा की नेगी जी के गानों का वास्तविकता से कोई वास्ता नहीं हैं.

गढ़वाल और जातपात

जातपात का गढ़वाल मैं अपना एक महत्व हैं जो की काफी मजबूत था और अभी भी हमारे बाप दादाओं मैं काफी हद तक अपनी जगह बनाये हुए हैं और हम इस बात को किसी भी रूप मैं ठुकरा नहीं सकते, धीरे धीरे जातपात का असर कम होता जा रहा हैं लेकिन यह शायद कभी ख़तम नहीं हो पायेगा, न केवल गढ़वाल मैं बल्कि पुरे भारतवर्ष मैं. गढ़वाल मैं अपने आप को ऊँची जात का होना और समझा जाना काफी महत्व रखता था और अभी भी काफी लोगों मैं यह भावना भरी हुयी हैं की हम ऊँची जात के हैं और दूसरा नीची जात का, रिश्ते भी जाती के आधार पर बनाये जाते हैं, क्षत्रियों और ब्राह्मणों मैं ही आपस मैं जब जातपात का भेदभाव चलता हैं तो हरिज़नो के साथ यह अपनी उच्चतम सीमा पर होता हैं. आप को क्या लगता हैं की क्या जातपात गढ़वाल से समाप्त हो पायेगा?

आगे बढने का डर

हर कोई चाहता है की उसका देश, राज्य, जिल्ला, गाँव आगे बड़े और विश्व में अपना नाम करें, लेकिन शायद गढ़वाली परिपक्व लोगों की सोच इस सबसे हट कर है, वे सोचते हैं की उनका गढ़वाल आगे जाने की बजाये पीछे जाए, क्यूंकि आगे उन्हें अपने गढ़वाल का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा हैं. दिन प्रतिदिन बढती अनेको सुख के बावजूद वो खुश और संतुष्ट महसूस नहीं कर रहे हैं, आज घर घर मैं टीवी, डिश, सी डी प्लयेर सब हैं पर वो गाँव के एक घर मैं इकठा होकर किसी फिल्म या नाटक को देखने का मज़ा अलग ही था, आने वाली फिल्म और देखि गई फिल्म के बारे मैं पुरे हफ्ते चर्चा करने का अनुभव ही अलग था. हर घर मैं गाय, बैल और भैंस हुआ करती थी, सड़कों पर चलने वाली एक एक बस का नंबर याद रहता था. गाँव के पास से गुजरने वाली दुल्हन को देखने के लिए लोगों का ताँता लग जाता था और उसके रोने की आवाज़ की दुरी से उसके सुशिल होने का अंदाज़ा लगाया जाता था. गाँव मैं होने वाली शादी का खुमार एक महीने पहले से शुरू हो जाता था, विडियो और नचाड़ का इंतज़ार बेसब्री से किया जाता था. होली दीवाली जैसे त्यौहार के समीप आने की ख़ुशी को समेटने के लिए दिलों मैं जगह कम पड ज...

बलि प्रथा

बलि प्रथा को मैं भी उचित नहीं समझता पर आप इस से इंकार नहीं कर सकते की इसका कोई औचित्य नहीं हैं. गाँव में कई बार जागर मैं जाकर मैंने देवी देवताओं या भूतों को बलि की मांग करते सुना हैं, तो क्या जागर मैं नाचने वाले सब पाखंडी होते हैं जो बलि की मांग करते हैं? बलि की मांग होने पर और न देने पर परिवार मैं होने वाली किसी भी घटना को आशंका की दृष्टि से देखा जाएगा. बलि दिए जाने के मामले में कभी किसी भी देवी देवता ने यह नहीं कहा की मुझे बलि नहीं चाहिए थी, लेकिन यह जरूर कहा हैं की पूजा उचित तरीके न होने के कारन आपका कार्य संपन्न नहीं हुआ.

गढ़वाल मैं उत्पन्न होती समस्याएँ

जैसे जैसे गढ़वाल उन्नति कर रहा है (इसे आप अवन्नती भी कह सकते है) दिन प्रतिदिन नयी नयी समस्याएँ उत्पन्न हो रही है, जो आगे चल कर एक भयंकर रूप धारण कर सकती है, जैसे की : जल संकट, घरेलु ...