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बस तुम आ जाओ।

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Compulsion

The man settled himself in the hotel chair with his family to give a soothing and different experience to the taste buds. After deciding food items from the menu with the consent of his family, he respectfully called the waiter and on arrival of the waiter asked him to serve the selected food items. The food was served and everyone was enjoying the meal, in between, he realised that more water is needed, he again called the waiter respectfully and said he needed more drinking water, the waiter left to fetch the water. 5 minutes passed and he observed that the same waiter is serving to other customers, he indicated to the waiter for water and waiter nodded his head in agreement. Another 5 minutes passed and he found that waiter is serving to another customer, he again indicated to the waiter and the waiter shook his head again. He realised that his politeness & respect is being taken granted, soon waiter appeared with a different thing for another customer, th...

प्रयास

लाल बत्ती की दूसरी तरफ रुके हरे-पिले रंग के शेयरिंग ऑटो को निहारते हुए मन ही मन वो एक सीट मिल पाने की उम्मीद के साथ बार बार अपने फ़ोन मे बढ़ते और ऑफिस के लिए कम होते हुए समय को देख ...

स्थिरता

इस दुनिया में स्थिर कुछ भी नही, आज जो हमें सही लगता है कुछ समय पशचात वही गलत लगने लग जाता है। ऐसे मे जब हम अपनी जुबान का मान खुद ही नही रख सकते तो दूसरों से कैसे उम्मीद रख सकते है...

अजकाले की नोनी

क्या आप लुखूँ थे पता च की अजकाले नोनियू दगड़ क्या परेशानी च? तुमथे एक नोनी बजार म दिख्या। तुमुल वीन्थे मुंड बटे की खुटा तलक दयाख। तुमुल वीन्की छाती दयाख, तुमथे मस्त लगिन। तुमुल वीन्का पैथर दयाख, तुमथे मज़ा आ ग्या। तुमुल वीन्की कमर दयाख, तुमथे नशा चेड़ गया। व जरा उन्दू ख़ूणे झुक, तुमुल कनख़यूल वीन्का भीतर त दयाख। राति स्वीणो म तुमुल व अपणा बिस्तरम दयाख। क़तगे बणी का पोजम तुमुल वीन्का दगड़ अपथे दयाख। तुमरी भूख शांत हवेगे। अब तुम वीन्थे भूली ग्यो। हेंका दिन, तुमरी भुल्ली अर तुमरी ब्वारी गेनी वे बज़ार म। तुम त निछाई, पर तुमरी जगा आज क्वी और छाई। वेल भी वी दयाख, ब्याली जु तुमुल दयाख छाई। क्या याद च तुमथे की ब्याली तुमुल क्या दयाख छाई? और जण चाणा छौ, अजकाले की नोनियू दगड़ क्या परेशानी च?

आशिफ़ा

तो आशिफ़ा सबकी बेटी थी और उसके साथ हुए अत्याचार से सब आहत है, आपकी सोच और भावना बिल्कुल जायज़ है। लेकिन इस पुरुष प्रधान देश मे बलात्कारी किसी का बेटा नही है क्या...? वो किसी मशीन से उत्पन्न हुआ पुरुष मात्र का शरीर भर है क्या...? सवाल ये उठता है कि कसूरवार कौन है,  वो बलात्कारी जिसने ऐसा घृणित कार्य किया या उसका परिवार जिसने संस्कारों के रूप में उसके अवचेतन मन मे गलत कार्यों का सही से डर नही बिठाया, जिससे  उसके अंदर ऐसा अपराध करने की सोच उत्पन्न हुई, या फिर हमारा समाज जिसने उसके अंदर ऐसी लालसा उत्पन्न कर दी कि उसको इस अपराध के पीछे के परिणामों को भी पूर्णतया नज़रअंदाज़ कर दिया। अगर इसके पीछे वह स्वयं या उसके संस्कार है तो समाज के द्वारा उठाये जाने वाली आवाज़ जायज़ है लेकिन अगर इसमें समाज का योगदान भी सम्मिलित है तो समाज को कोई हक नही की वो सिर्फ बलात्कारी की सज़ा की मांग करे, समाज की मांग उन सब क्रियाकलापो को बंद करने की मांग दुगुनी आवाज़ के साथ उठाने की जरूरत है जो ऐसी घटनाओं की जन्मदाता है। वरना ऐसी घटनाओं में दोषी की सज़ा से ही सार्थकता सिद्ध नही हो जाती बल्कि ऐसी...

प्रकृति

भविष्य के लिए क्या जरूरी है? स्वास्थ्य। और स्वास्थ्य के लिए? शुद्ध हवा, जल, भोजन। ये सब कहाँ के मिलता है? प्रकृति से। प्रकृति के लिए आप क्या रहे हो? कुछ नही। तो जब ये प्रकृति ही नही रहेगी तो जो योजना आपने अपने बच्चों के भविष्य के लिए बनाई है वो कैसे पूरी होगी? चलो मान लेते है कि एक पीढ़ी तो प्रकृति और झेल ही लेगी, लेकिन करेंगे तो प्रकृति के लिए आपके बच्चे भी कुछ नही, तो फिर आपके नातियों के भविष्य का क्या होगा? आपकी आने वाली पीढ़ी का क्या होगा? चलो ठीक है, माना की आप के पास समय नही की आप प्रकृति को संचित रखने मे समय दे पाओ, लेकिन उसको जिस से नुकसान पहुंच रहा है वो तो बंद कर सकते हो। पॉलीथीन, प्रदूषण, कचरा, केमिकल, बिजली की बजट...इत्यादि। अच्छा!! तो ये भी नही हो पायेगा, चलो ऐसा कोई तो होगा जो प्रकृति को संचित रखना चाहता है और उसको बढ़ाना चाहता है। तो उसका साथ दो, उन लोगों को सपोर्ट करो जो प्रकृति के लिए योजनायें बना रहे है। इन नेताओं में से छांटो उन्हें जो प्रकृति की चिंता करता है। जात-पात, धर्म, आरक्षण जैसी चीज़ों को सपोर्ट करने से बेहतर है उन कामों और ...