Posts

Different

The day I meet this guy very first time, I realised he is different, different in a way that everyone around him wants to become like him.- The willpower he had was unmatched.- He was a diehard fan of Sanjay Dutt. Sunil Shetty was mine.- Extreme introvert. He can easily spent days without uttering a single word entire day.- He was a bookworm, witnessed many times when I found him reading books or solving math problems in very odd hours of the night, despite that he flunked high school once.- He get attracted towards difficult tasks.- He broke his hand once in process to save a friend falling from the tree.- He asked the doctor to stitch his wound without using any sort of anaesthesia.- He was fitness freak, influenced everyone around him.- In 9th standard, he had a fight with 4 students of 12th class, he beat them out alone and from that day he became famous in the school, even the senior bullies of the school supported him and became his friend.- He has no clue, how to propose or exp…

बस तुम आ जाओ।

Image

Compulsion

The man settled himself in the hotel chair with his family to give a soothing and different experience to the taste buds.
After deciding food items from the menu with the consent of his family, he respectfully called the waiter and on arrival of the waiter asked him to serve the selected food items.
The food was served and everyone was enjoying the meal, in between, he realised that more water is needed, he again called the waiter respectfully and said he needed more drinking water, the waiter left to fetch the water.
5 minutes passed and he observed that the same waiter is serving to other customers, he indicated to the waiter for water and waiter nodded his head in agreement.
Another 5 minutes passed and he found that waiter is serving to another customer, he again indicated to the waiter and the waiter shook his head again.
He realised that his politeness & respect is being taken granted, soon waiter appeared with a different thing for another customer, the man decided to speak in t…

प्रयास

लाल बत्ती की दूसरी तरफ रुके हरे-पिले रंग के शेयरिंग ऑटो को निहारते हुए मन ही मन वो एक सीट मिल पाने की उम्मीद के साथ बार बार अपने फ़ोन मे बढ़ते और ऑफिस के लिए कम होते हुए समय को देख रहा था।जैसे ही लाल रंग फिसल कर हरे रंग पर रुका मैंने भी अपनी बाइक को आगे बढ़ा दिया, उस युवक ने अपना हाथ रुकने के लिए दिया जो की मेरे पीछे आते ऑटो के लिए था लेकिन मैंने अपनी बाइक उसके सामने रोक दी, नज़रे मिली उसने पूछा सेक्टर 62 नोएडा तक छोड़ दोगे? मैंने कहा चलो।कुछ आगे चल कर पूछा की नोएडा में असल में कहाँ जाना है तो जवाब "फोर्टिस हॉस्पिटल" मिला। हालाँकि भारी यातायात की वजह से मैंने उस रास्ते से चलना बंद कर दिया था और एक थोड़ा लंबा लेकिन कम ट्रेफिक वाला रास्ता ढूँढ लिया था। उसके गंतव्य को जान कर सोचा चलो इसी बहाने पुराने रास्ते को एक बार फिर निहार लिया जाए। फोर्टिस हॉस्पिटल पर पहुँच कर सेवा स्वरूप धन्यवाद अर्जित किया आगे निकल चले।रोमांचक बात ये रही की, उसको पता है की उसने रुकने के लिए मुझे हाथ नही दिया था और मुझे भी पता है की उसने मुझे रोकने के लिए हाथ नही दिया था लेकिन उसको ये नही पता की ये बात मुझे पता…

स्थिरता

इस दुनिया में स्थिर कुछ भी नही, आज जो हमें सही लगता है कुछ समय पशचात वही गलत लगने लग जाता है। ऐसे मे जब हम अपनी जुबान का मान खुद ही नही रख सकते तो दूसरों से कैसे उम्मीद रख सकते है। समय और परिस्तिथियाँ आपके अपने से किये गए वादों को ही बदल देती है। एक नज़र...बचपन में जो करेला हमें फूटी आंख नही सुहाता था और भगवान से शिकायत थी की क्या सोच कर इसे सब्ज़ी बनाया, आज वही करेला हमारा प्रिय है।दूरदर्शन के समय से जिन समाचारों ने मनोरंजन में खलनायक की भूमिका निभाई, आज टीवी सिर्फ उन्हीं समाचारों के लिए देखा जाता है।ब्रश करना, नहाना कपड़े बदलना इत्यादि नित्यक्रम के ये कार्य हमेशा से फालतू के कार्य लगते थे, आशिक़ी का भूत चढ़ा नही की वही सब कुछ  एक दिन मे दो-दो करने पर भी कम लगता है।जिस तीव्र गति से वाहन चलाने में रोमांच महसूस होता है, आज वही तीव्रता मौत का निमंत्रण लगता है।जिन गानों पर कभी पाँव थिरकते थे, आज वही गाने फूहड़ लगते है और जिन पुराने गानो को सुन कर कान पक जाते थे, आज वही गाने असली संगीत प्रतीत होता है।जो स्कूल हमेशा से बोझ महसूस होता था, वही आज अविस्मरणीय यादों का पिटारा है।जिन मार-धाड़ की फिल्मो…

अजकाले की नोनी

क्या आप लुखूँ थे पता च की अजकाले नोनियू दगड़ क्या परेशानी च?तुमथे एक नोनी बजार म दिख्या।
तुमुल वीन्थे मुंड बटे की खुटा तलक दयाख।
तुमुल वीन्की छाती दयाख, तुमथे मस्त लगिन।
तुमुल वीन्का पैथर दयाख, तुमथे मज़ा आ ग्या।
तुमुल वीन्की कमर दयाख, तुमथे नशा चेड़ गया।
व जरा उन्दू ख़ूणे झुक, तुमुल कनख़यूल वीन्का भीतर त दयाख।
राति स्वीणो म तुमुल व अपणा बिस्तरम दयाख।
क़तगे बणी का पोजम तुमुल वीन्का दगड़ अपथे दयाख।
तुमरी भूख शांत हवेगे। अब तुम वीन्थे भूली ग्यो।हेंका दिन, तुमरी भुल्ली अर तुमरी ब्वारी गेनी वे बज़ार म।
तुम त निछाई, पर तुमरी जगा आज क्वी और छाई।
वेल भी वी दयाख, ब्याली जु तुमुल दयाख छाई। क्या याद च तुमथे की ब्याली तुमुल क्या दयाख छाई?और जण चाणा छौ, अजकाले की नोनियू दगड़ क्या परेशानी च?

आशिफ़ा

तो आशिफ़ा सबकी बेटी थी और उसके साथ हुए अत्याचार से सब आहत है, आपकी सोच और भावना बिल्कुल जायज़ है।लेकिन इस पुरुष प्रधान देश मे बलात्कारी किसी का बेटा नही है क्या...? वो किसी मशीन से उत्पन्न हुआ पुरुष मात्र का शरीर भर है क्या...?सवाल ये उठता है कि कसूरवार कौन है,  वो बलात्कारी जिसने ऐसा घृणित कार्य किया या उसका परिवार जिसने संस्कारों के रूप में उसके अवचेतन मन मे गलत कार्यों का सही से डर नही बिठाया, जिससे  उसके अंदर ऐसा अपराध करने की सोच उत्पन्न हुई या फिर हमारा समाज जिसने उसके अंदर ऐसी लालसा उत्पन्न कर दी कि उसको इस अपराध के पीछे के परिणामों को भी पूर्णतया नज़रअंदाज़ कर दिया।अगर इसके पीछे वह स्वयं या उसके संस्कार है तो समाज के द्वारा उठाये जाने वाली आवाज़ जायज़ है लेकिन अगर इसमें समाज का योगदान भी सम्मिलित है तो समाज को कोई हक नही की वो सिर्फ बलात्कारी की सज़ा की मांग करे, समाज की मांग उन सब क्रियाकलापो को बंद करने की मांग दुगुनी आवाज़ के साथ उठाने की जरूरत है जो ऐसी घटनाओं की जन्मदाता है। वरना ऐसी घटनाओं में दोषी की सज़ा से ही सार्थकता सिद्ध नही हो जाती बल्कि ऐसी घटनाओं के लिए ये निम्नतम सज़ा सि…