Saturday, May 8, 2010

गढ़वाली परिपक्व लोग सोचते हैं की उनका गढ़वाल आगे जाने की बजाये पीछे जाए, क्यूंकि आगे उन्हें गढ़वाल का भविष्य सुरक्षित नहीं दिख रहा हैं, अनेको सुख सुभिदाओं ke बावजूद वो खुश और संतुष्ट महसूस नहीं कर रहे हैं, आज घर घर मैं टीवी, डिश, सी दी प्लयेर हैं पर वो गाँव ke एक घर मैं इकठा होकर किसी फिल्म या नाटक को देखने का मज़ा अलग ही था, आने वाली फिल्म और देखि फिल्म ke बारे मैं पुरे हफ्ते चर्चे होते थे.
हर घर मैं गाय और भैंश हुआ करती थी, सड़कों पर चलने वाली एक एक बस का नंबर याद रहता था. दुल्हन को देखने ke लीये लोगों का ताँता लग जाता था और उसके रोने की आवाज़ की दुरी से उसके सुशिल होने का अंदाज़ा लगाया जाता था. गाँव मैं होने वाली शादी का खुमार एक महीने पहले से शुरू हो जाता था, विडियो और नाचाड का इंतज़ार बेसब्री से किया जाता था. होली दीवाली जैसे त्यौहार ke समीप आने की ख़ुशी को समेटने ke लीये दिलों मैं जगह कम पड जाया करती थी. कौथिग का जोश ख़तम होने का नाम नहीं leta था. दुकानों मैं बिकने वाली सब्जी अक्सर सड जाया करती थी और खरीदने वाला शर्म महसूस करता था की लोग क्या कहेंगे की दुकान से सब्जी खरीदनी पड rahi हैं

No comments:

Post a Comment