आग और धुआं

बिना आग के तो धुआं नहीं उठता
अगर आप गौर करेंगे तो पायेंगे की जितने भी परिवार गाँव मैं विषम परिस्तिथियों में जी रहे हैं उसमें कहीं न कहीं दारु का एक महतवपूर्ण योगदान हैं. गाँव मैं ज्यादातर फौजी रहते हैं और पेंसन आने के बाद अगर उन्होंने कोई काम धंधा कर लिया तो ठीक नहीं तो सिर्फ दारु पिने के लिए जीवित हैं, जिसकी वजह से उनके परिवार वालों को न जाने क्या क्या सेहन करना पड़ता हैं!

रोज़गार गाँव मैं कम ही हैं और जो भी हैं वो मेहनत वाला होता हैं ऐसे मैं जब आदमी सारा दिन काम करता हैं और शाम को दारू पर पैसे बर्बाद कर देता हैं तो उसके असर को आप एक परिवार का सदस्य न होने पर भी महसूस कर सकते हैं, ऐसे अनेको उदाहरण आपको हर गाँव में मिल जायेंगे.
दारु वैसे तो सभी की एक बहुत बड़ी कमजोरी हैं लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर गढ़वाल में इसके काफी भयंकर परिणाम देखने को मिलते हैं जिसके चलते परिवार का कोई सदस्य प्रगति नहीं कर पाता!

अब तो आलम यह हो चूका हैं हे की १० साल का बच्चा भी दारू की गिरफ्त में आ चूका हे और व्यस्क होने पर और अपूर्ण शिक्षा और परिवार के भरण पोसन की जिमेदारी लेकर शहर मैं पहुँचता हैं तो दारु को ही अपना साथी मानता है

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