Wednesday, September 15, 2010

गढ़वाल की विलुप्त होती रोनक

इंसान की भावनाए, चाहते अक्सर समय के अनुसार बदलती रहती हैं!
ऐसा ही हाल शहर मैं और गाँव मैं रहने वाले गढ़वालियों का भी हैं. शहर मैं रहने वाले सोच रहे हैं की रिटायर होने के बाद गाँव मैं जायेंगे और वही पर अपनी जिंदगी अपने लोगों, पहाड़ो, खेतो के बीच बिताएंगे!
वहीँ गाँव मैं रहने वाला गढ़वाली सोच रहा हैं की मैं कब इस गाँव को छोड़ कर शहर मैं जा कर बस जाऊं और इस गढ़वाल के मुश्किल और दूभर जिंदगी से छुटकारा पाके शहर की आराम दायक जिंदगी का लुत्फ़ उठाऊं.

जिस मैं जीत गाँव मैं रहने वाले गढ़वाली की होती परतीत हैं, कुछ तो सफल हो जाते हैं तो बाद मैं गाँव मैं रिटायर हो के गाँव जाने का विचार करते हैं लेकिन कुछ गढ़वाली शहर मैं आकर फंस जाते हैं पर शर्म, असफलता से दुबारा घर जाना उचित नहीं समझते!

आलम यह हो चूका हैं की अगर आप शहर मैं रहते हो और शादी या अन्य किसी समारोह के बिना गाँव जाते हो तो आप को वहां इतनी बोरियत महसूस होती है की आप दुसरे ही दिने वापस आने का प्रोग्राम बना लेते हो, इसके पीछे दिन परती दिन गाँव से होने वाला पलायन हैं, जिस से गाँव की रौनक एक तरह से समाप्त सी हो गयी हैं!

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